| 2901 | राज्य को नीतिशास्त्र के अनुसार चलना चाहिए। |
| 2902 | राज्य नीति का संबंध केवल अपने राज्य को सम्रद्धि प्रदान करने वाले मामलो से होता है। |
| 2903 | राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते है। |
| 2904 | राज्यतंत्र से संबंधित घरेलु और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है। |
| 2905 | रात में सोने से पहले हर किसी को हर किसी बात के लिए क्षमा कर देना ही एक लम्बे और सुखदायक जीवन का रहस्य है। |
| 2906 | रात होने पर अनेक जातियों के पक्षी कौवा, तोता कबूतर आदि एक ही वृक्ष पर आ बैठते हैं और रात्रि वही बिताते हैं और प्रभात होने पर दाना चुगने के लिए भिन्न-भिन्न दिशाओ में उड़ जाते हैं। यही स्थिति परिवार के सदस्यों की भी हैं, कुछ लोग एक परिवार रूपी वृक्ष पर आकर बैठते हैं और समय आने पर चल देते हैं इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं आवागमन और संयोग-वियोग तो जीवो का नित्य धर्म हैं। |
| 2907 | रात्रि में नहीं घूमना चाहिए। |
| 2908 | राय, ज्ञान और ज्ञान के बीच एक माध्यम है। |
| 2909 | राष्ट्रभक्ति की भावना सामाजिक भेदों से पैदा होने वाली घृणा से अक्सर ज्यादा मजबूत होती है। अन्तर्राष्ट्रीयवाद तो इसके आगे हमेशा कमजोर होता है। |
| 2910 | राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है। |
| 2911 | रिलायंस की सफलता का राज़ मेरी महत्वाकांक्षा और अन्य पुरुषों का मन जानना है. |
| 2912 | रिलायंस में विकास की कोई सीमा नहीं है। मैं हमेशा अपना vision दोहराता रहता हूँ। सपने देखकर ही आप उन्हें पूरा कर सकते हैं। |
| 2913 | रिश्ते चाहे कितने ही बुरे हो उन्हे तोङना मत क्योकि पानी चाहे कितना भी गंदा हो अगर प्यास नही बुझा सकता पर आग तो बुझा सकता है। |
| 2914 | रिश्ते, आजकल रोटी की तरह हो गए जरा सी आंच तेज क्या हुई जल भुनकर खाक हो जाते। |
| 2915 | रूप और यौवन से संपन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विध्या से रहित है तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता। |
| 2916 | रूप की शोभा गुणों से होती हैं, कुल की शोभा शील अथार्थ अच्छे आचरण से होती हैं विधा की शोभा धन प्राप्ति से होती हैं इसी प्रकार धन की शोभा उसके भोगने से होती हैं। |
| 2917 | रूप के अनुसार ही गुण होते है। |
| 2918 | रूप-यौवन से सम्पन्न, बड़े कुल में पैदा होते हुए भी, विद्याहीन पुरुष, बिना गंध के फूल पलाश के समान शोभा अर्थात आदर को प्राप्त नहीं होता। |
| 2919 | रोकथाम के बिना उपचार अस्थायी है। |
| 2920 | रोज स्टेटस बदलने से जिंन्दगी नहीं बदलती जिंदगी को बदलने के लिये एक स्टेटस काफी है. |
| 2921 | रोज़ाना व्यायाम करने से शरीर चुस्त रहता है, साथ ही दिमाग को भी शान्ति मिलती है। |
| 2922 | लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, प्राण भी अनित्य है। इस चलते-फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर है। |
| 2923 | लक्ष्मी भगवान विष्णु से कहती है 'हे नाथ ! ब्राह्मण वंश के आगस्त्य ऋषि ने मेरे पिता (समुद्र)को क्रोध से पी लिया, विप्रवर भृगु ने मेरे परमप्रिय स्वामी (श्री विष्णु) की छाती में लात मारी, बड़े-बड़े ब्राह्मण विद्वानों ने बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक मेरी शत्रु सरस्वती को अपनी वाणी में धारण किया और ये (ब्राह्मण) उमापति (शंकर) की पूजा के लिए प्रतिदिन हमारा घर (श्रीफल पत्र आदि) तोड़ते है। हे नाथ ! इन्ही कारणों से सदैव दुःखी मैं आपके साथ रहते हुए भी ब्राह्मण के घर को छोड़ देती हूं। |
| 2924 | लक्ष्य प्राप्त करना मायने रखता है. और जो बहादुरी भरे काम और साहसिक सपने आप पूरे करना चाहते हैं उनके बारे में लिखना उन्हें पूरा करने के लिए चिंगारी का काम करेगा. |
| 2925 | लकड़ी, पत्थर और धातु-सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि की बनी देवमूर्ति में देव-भावना, अथार्थ देवता को साक्षात् रूप से विधमान समझ कर ही श्रदासहित उसकी अर्चना पूजा करनी चाहिए, जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता हैं, श्री विष्णुनारायण की कृपा से उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती हैं। |
| 2926 | लगन हो पक्की तो मंजिल का पता मिलता है ! चाहत हो सच्ची तो पत्थर में खुदा मिलता है।। |
| 2927 | लगभग सभी व्यक्ति कठिनाई को झेल सकते है, पर अगर आपको उनका चरित्र जानना हो तो उन्हें शक्ति दे दीजिए। |
| 2928 | लगभग हर व्यक्ति जो किसी आईडिया को विकसित करता है, उस पर तब तक काम करता है जब तक वो असंभव न लगने लगे, और उसके बाद वो निराश हो जाता है जबकि ये वो जगह नहीं जहाँ निराश हुआ जाए। |
| 2929 | लगातार पवित्र विचार करते रहे, बुरे संस्कारो को दबाने के लिए एकमात्र समाधान यही है। |
| 2930 | लगातार हो रही असफलताओ से निराश नही होना चाहिए क्योक़ि कभी-कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है। |
| 2931 | लम्बी बहसों से दूर रहे वाले लोग हमेशा खुश रहते हैं, क्योकि वे क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते इसलिए आप दूसरों के नजरिये को समझिये और उनके करीब रहने का प्रयास कीजिये। |
| 2932 | लम्बे नाख़ून वाले हिंसक पशुओ, नदियों, बड़े बड़े सींग वाले पशुओ, शस्त्रधारियो, स्त्रियों और राज-परिवारों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए |
| 2933 | लम्बे-लम्बे भाषणों से कही अधिक मूल्यवान है इंच भर कदम बढ़ाना। |
| 2934 | लाख आदि, तेल, नील, कपडे रेंज के रंग, शहद घी मदिरा और मांस आदि का व्यापार करने वाला ब्राह्मण शुद्र कहलाता हैं। |
| 2935 | लाड-प्यार से पुत्र और शिष्य में दोष उत्पन्न हो जाते हैं और ताड़ना से उनमे से गुणों का विकास होता हैं उनका कहना हैं की इसलिए पुत्र और शिष्य को लाड-प्यार करने की अपेक्षा ताड़ना करनी चाहिए। |
| 2936 | लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है। |
| 2937 | लाल रंग के किंशुक पुष्प दिखने में तो बहुत सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनमे सुंगध नहीं होती, अतः कोई भी उनकी और ध्यान नहीं देता जिस प्रकार गंधरहित होने से किंशुक के पुष्प उपेक्षित ही रहते हैं और देवो-सम्राटो के सर पर चढ़ने का गौरव नहीं प्राप्त कर पाते उसी प्रकार उच्चे कुल में उत्पन्न विधा से रहित रूपवान युवक भी समाज में आदर प्राप्त नहीं कर पाते। |
| 2938 | लालची व्यवहार से भयानक कुछ भी नहीं। |
| 2939 | लाश को हाथ लगाता है तो नहाता है ...पर बेजुबान जीव को मार के खाता है |
| 2940 | लीडर को अपनी क्षमता के अनुरूप नेतृत्व करने के बाद हट जाना चाहिए। नहीं तो उनकी जलाई आग कहीं उनकी ही राख से बुझ न जाए। |
| 2941 | लेखक को मानवजाति का इंजीनियर कहना गलत नही है। |
| 2942 | लोक चरित्र को समझना सर्वज्ञता कहलाती है। |
| 2943 | लोक व्यवहार शास्त्रों के अनुकूल होना चाहिए। |
| 2944 | लोकतंत्र सरकार का सबसे खराब रूप है सिवाय उन सरकारों के जिन्हें इससे पहले आजमाया जा चुका है। |
| 2945 | लोकतंत्र तब है जब किसी अमीर की जगह कोई गरीब देश का शासक हो। |
| 2946 | लोकतंत्र तानाशाही में गुजरता है। |
| 2947 | लोग अवास्तविक, विसंगत और आत्मा केन्द्रित होते हैं फिर भी उन्हें प्यार दीजिये। |
| 2948 | लोग इसकी परवाह नहीं करते हैं कि आप कितना जानते हैं, वो ये जानना चाहते हैं कि आप कितना ख़याल रखते हैं। |
| 2949 | लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है, और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते.. |
| 2950 | लोग धूल की तरह होते हैं। या तो वो आपको पोषण दे एक व्यक्ति के रूप में विकसित होने में मदद कर सकते हैं, या वो आपका विकास रोककर और थका कर मृत कर सकते हैं। |
| 2951 | लोग बस वही देखते है, जो देखने के लिए वो तैयार होते है। |
| 2952 | लोग वही के वही बने रहते है, तब भी जबकि उनके मुखौटे निकल चुके होते है। |
| 2953 | लोग सबसे ज्यादा झूठ तीन बार कहते है- चुनाव से पहले, जंग के दौरान और शिकार करते वक़्त। |
| 2954 | लोग हमेशा ही परिवर्तन से डरते है, बिजली से भी डरे थे जब तक की उसका अविष्कार नही हुआ था। |
| 2955 | लोगो की हित कामना से मै यहां उस शास्त्र को कहूँगा, जिसके जान लेने से मनुष्य सब कुछ जान लेने वाला सा हो जाता है। |
| 2956 | लोगो को यह नहीं पता की उन्हें क्या नहीं पता |
| 2957 | लोगों का बड़ा समूह छोटे झूठ की अपेक्षा बड़े झूठ का आसानी से शिकार बन जाता है। |
| 2958 | लोगों के साथ विन्रम होना सीखे। महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है पर अच्छा होना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। |
| 2959 | लोगों को काम के लिए प्रोत्साहित करना और अहसास कराना की ये उन्हीं का सुझाव था, ये सबसे समझदारी की बात है। |
| 2960 | लोगों में सुधार लाए बिना, सुनहरे भविष्य की कामना करना बिल्कुल गलत है। ऐसा तभी मुमकिन होगा जब हर व्यक्ति खुद को बदलने की कोशिश करें। इसी के साथ वह अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। |
| 2961 | लोभ द्वारा शत्रु को भी भ्रष्ट किया जा सकता है। |
| 2962 | लोभ सबसे बड़ा अवगुण है, पर निंदा सबसे बड़ा पाप है, सत्य सबसे बड़ा तप है और मन की पवित्रता सभी तीर्थो में जाने से उत्तम है। सज्जनता सबसे बड़ा गुण है, यश सबसे उत्तम अलंकार(आभूषण) है, उत्तम विद्या सबसे श्रेष्ठ धन है और अपयश मृत्यु के समान सर्वाधिक कष्टकारक है। |
| 2963 | लोभ से बड़ा दुर्गुण क्या हो सकता है। परनिंदा से बड़ा पाप क्या है और जो सत्य में प्रस्थापित है उसे तप करने की क्या जरूरत है। जिसका ह्रदय शुद्ध है उसे तीर्थ यात्रा की क्या जरूरत है। यदि स्वभाव अच्छा है तो और किस गुण की जरूरत है। यदि कीर्ति है तो अलंकार की क्या जरुरत है। यदि व्यवहार ज्ञान है तो दौलत की क्या जरुरत है। और यदि अपयशी या अपमानित है तो मृत्यु कि क्या जरुरत हैं अथार्थ वह व्यक्ति जीते जी ही मरा हुआ हैं। |
| 2964 | लोभियों का शत्रु भिखारी है, मूर्खो का शत्रु ज्ञानी है, व्यभिचारिणी स्त्री का शत्रु उसका पति है और चोरो का शत्रु चंद्रमा है। |
| 2965 | लोभी और कंजूस स्वामी से कुछ पाना जुगनू से आग प्राप्त करने के समान है। |
| 2966 | लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए। |
| 2967 | लोभी व्यक्तियों के लिए चंदा, दान मांगने वाले व्यक्ति शत्रुरूप होते हैं, मूर्खो को भी समझाने-बुझाने वाला व्यक्ति अपने शत्रु लगता हैं। दुराचारिणी स्त्रियों के लिए पति ही उनका शत्रु होता हैं, चोर चंद्रमा को अपना शत्रु मानते हैं इसलिए मुर्ख को सीख और लोभी से कुछ मांगने की भूल नहीं करनी चाहिए। |
| 2968 | लड़ना गलत नहीं, लेकिन लड़ने की सोच रखना सबसे गलत है। |
| 2969 | लड़ाई-झगडे ख़त्म करने के लिए समझदार होना जरुरी है, उसी तरह से अच्छा प्रदर्शन देने के लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है। |
| 2970 | वक्त बहुत कम है अगर हमे कुछ करना है तो अभी से शुरू कर देना चाहिए। |
| 2971 | वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है। |
| 2972 | वर्ष भर नित्यप्रति मौन रह कर भोजन करने वाला करोडो चतुर्युगो तक (एक युग से चार युग –सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलयुग होते हैं और प्रत्येक की आयु क्र्मशा 12, 10, 8, और 6 वर्ष मानी गई हैं ) स्वर्ग में निवास करता हैं और देवो द्वारा पूजा जाता हैं। |
| 2973 | वसंत ऋतु में यदि करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं आते तो इसमें वसंत का क्या दोष है ? सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर यदि दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है ? इसी प्रकार वर्ष का जल यदि चातक के मुंह में नहीं पड़ता तो इसमें मेघों का क्या दोष है ? इसका अर्थ यही है कि ब्रह्मा ने भाग्य में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है ? |
| 2974 | वह व्यक्ति या वह समाज जिसके पास सीखने को कुछ नहीं है वह पहले से ही मौत के जबड़े में है। |
| 2975 | वह इंद्र के राज्य में जाकर क्या सुख भोगेगा, जिसकी पत्नी प्रेमभाव रखने वाली और सदाचारी है। जिसके पास में संपत्ति है। जिसका पुत्र सदाचारी और अच्छे गुण वाला है जिसको अपने पुत्र द्वारा पौत्र हुए है। |
| 2976 | वह काम सबसे पहले करो, जिसे करने में आपको डर लगता है। |
| 2977 | वह चीज जो दूर दिखाई देती है, असंभव दिखाई देती है और हमारी पहुँच से बहार दिखाई देती है, वह भी आसानी से हासिल कि जा सकती है यदि व्यक्ति तप करता है, क्यों की तप से ऊपर कुछ भी नहीं हैं। |
| 2978 | वह जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पचास संकट हैं, वो जो किसी से प्रेम नहीं करता उसके एक भी संकट नहीं है। |
| 2979 | वह जो भी मनुष्य का दिमाग बना सकता है, उसे उसका चरित्र नियंत्रित कर सकता है। |
| 2980 | वह मनुष्य व्यर्थ ही पैदा होता है, जो बहुत ही कठिनाईयों से प्राप्त होने वाले मनुष्य जन्म को यूँ ही गवां देता हैं और अपने पुरे जीवन में भगवान का अहसास करने की कोशिश ही नहीं करता है। |
| 2981 | वह लोग धन्य है, जिन्होंने संसार रूपी समुद्र को पार करते हुए एक सच्चे ब्राह्मण की शरण ली। उनकी शरणागति ने नौका का काम किया। वे ऐसे मुसाफिरों की तरह नहीं है जो ऐसे सामान्य जहाज पर सवार है और जिसको डूबने का खतरा है। |
| 2982 | वह व्यक्ति जिसके हाथ स्वच्छ है वह कार्यालय में काम नहीं करना चाहता अर्थात् उसे किसी पद की चाहत नहीं हैं, जिस ने अपनी कामनाओ को खत्म कर दिया है वह शारीरिक श्रंगार नहीं करता, मुर्ख पुरुष प्रिय और मधुर वचन नहीं बोल पाता, स्पष्ट बोलने वाला कभी धोखेबाज, धूर्त और मक्कार नहीं होता। |
| 2983 | वह सब कुछ प्राप्त कर लेता हैं जो इन्तजार करने के बजाय विपरीत परिस्थियों में भी काम करता रहता हैं। |
| 2984 | वहां प्रेम नहीं है जहां इच्छा नहीं है . |
| 2985 | वही कार्य सबसे अच्छा है जिससे बहुसंख्यक लोगो को अधिक से अधिक आनंद मिल सके। |
| 2986 | वही जाए जहाँ सिर्फ समझदारी की बातें होती है, इसलिए बेवकूफ लोगों से भरे जन्नत से बेहतर समझदार नर्क में जाना होगा। |
| 2987 | वही दो लोग, करीबी दोस्त बन सकते है जो किसी एक चीज से प्रेरित होते है। |
| 2988 | वही राज्य जल्दी आगे बढ़ता है जहां नियम कानून कम होते है, लेकिन जितने भी कानून होते है उनका पालन बहुत सख्ती से किया जाता है। |
| 2989 | वही लोग सफल होते हैं जो जानते हैं कि वे सफल ही होंगे। |
| 2990 | वही व्यक्ति खुश रहना जानता है जो चीज़ों और घटनाओं के होने का कारण जानता है। |
| 2991 | वही व्यक्ति बुद्धिमान हैं जो अवसर के अनुकूल बात करें, अपनी सामर्थ्य के अनुरूप साहस करें और अपनी शक्ति के अनुरूप क्रोध करें। इसके विपरीत अवसर को बिना पहचाने उल-जुलूल बातें करने वाला, अपनी शक्ति से बढ़कर दुस्साहस करने वाला निश्चित रूप से ही संकट में पड़ जाता हैं और दुखी होता हैं। |
| 2992 | वही साधुता है कि स्वयं समर्थ होने पर क्षमाभाव रखे। |
| 2993 | वास्तविक सोन्दर्य ह्रदय की पवित्रता में है। |
| 2994 | वास्तविकता को जानने का मतलब है कि आप बदलाव के लिए ऐसी पद्धति विकसित करे जो वास्तविकता के हो। |
| 2995 | वाहनों पर यात्रा करने वाले पैदल चलने का कष्ट नहीं करते। |
| 2996 | विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है। |
| 2997 | विचार न करके कार्ये करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है। |
| 2998 | विचार सारे भाग्य का प्रारंभिक बिंदु है। |
| 2999 | विचार, धन है, हिम्मत रास्ता है। कड़ी मेहनत समाधान है। |
| 3000 | विचारों पर किसी का एकाधिकार नहीं है। |
Monday, July 4, 2016
#2901-3000
Sunday, July 3, 2016
#2801-2900
| 2801 | यह नहीं कहा जा सकता हैं कि प्रत्येक पर्वत पर मणि-माणिक्य की प्राप्त होंगे, इसी प्रकार प्रत्येक हाथी के मस्तक से मुक्ता–मणि नहीं प्राप्त होती। संसार में मनुष्यों की कमी न होने पर भी अच्छे पुरुष सब जगह नहीं मिलते। इसी प्रकार चन्दन के कुछ वन तो हैं, परन्तु सभी वनों में चन्दन के वृक्ष उपलब्ध नहीं होते। |
| 2802 | यह निश्चय करना की आपको क्या नहीं करना है उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना की यह निश्चय करना की आप को क्या करना है। |
| 2803 | यह निश्चय है कि बंधन अनेक है, परन्तु प्रेम का बंधन निराला है। देखो, लकड़ी को छेदने में समर्थ भौंरा कमल की पंखुड़ियों में उलझकर क्रियाहीन हो जाता है, अर्थात प्रेमरस से मस्त हुआ भौंरा कमल की पंखुड़ियों को नष्ट करने में समर्थ होते हुए भी उसमे छेद नहीं कर पाता। |
| 2804 | यह निश्चित है की शरीरधारी जीव के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विध्या, मृत्यु इन पांचो की सृष्टि साथ-ही-साथ हो जाती है। |
| 2805 | यह बच्चों के साथ ही संभव है की आप तर्क, गणित भौतिक ज्ञान के विकास की प्रक्रिया को समझ सकते है |
| 2806 | यह बात कई बार कही जा चुकी हैं कि बाहरी चीजों में खुशिया न तलाशें। अगले साल में प्रवेश करने से पहले इस बात को गाँठ बांध लीजिये। |
| 2807 | यह मंदिर-मस्ज़िद भी क्या गजब की जगह है दोस्तो, जंहा गरीब बाहर और अमीर अंदर 'भीख' मांगता है.. |
| 2808 | यह मधु मक्खी जो कमल की नाजुक पंखडियो में बैठकर उसके मीठे मधु का पान करती थी, वह अब एक सामान्य कुटज के फूल पर अपना ताव मारती है।क्यों की वह ऐसे देश में आ गयी है जहा कमल है ही नहीं, उसे कुटज के पराग ही अच्छे लगते है। |
| 2809 | यह मन, यह विश्वास जिसमे हैं, वे ही कह सकते हैं कि दरिद्रता ही हमारी प्रतिज्ञा हैं |
| 2810 | यह महत्वपूर्ण नहीं है आपने कितना दिया, बल्कि यह है की देते समय आपने कितने प्रेम से दिया। |
| 2811 | यह महत्वपूर्ण नहीं है की आपके पास क्या नहीं है। आपके पास क्या है और आप उसका कैसे उपयोग करते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। |
| 2812 | यह महान आदमी की निशानी है कि वह तुच्छ चीजों को तुच्छ की तरह और महत्वपूर्ण बातों को महत्वपूर्ण की तरह महत्व देते है। |
| 2813 | यह मानव-जीवन सीमित हैं और कार्यो और ज्ञान की सीमा अनंत हैं इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ही ग्रहण करना चाहिए।उसी प्रकार जैसे हंस पानी छोड़कर उसमे मिला हुआ दूध पी लेता है। |
| 2814 | यह विधि की विडम्बना हैं कि स्वर्ण में गन्ध, गन्ने में फल और चन्दन में फूल नहीं होते, इसी प्रकार विद्वान धनी नहीं होते और राजा दीर्घायु नहीं होते। |
| 2815 | यह संसार आशा के सहारे बंधा है। |
| 2816 | यह संसार की रीति हैं कि पंडितों से मुर्ख ईर्ष्या करते हैं, निर्धन बड़े बड़े धनिकों से अकारण द्वेष करते हैं वैश्याए तथा व्यभिचारिणी स्त्रिया पतिव्रताओ से तथा सौभाग्यवती स्त्रियों से विधवाएं द्वेष करती हैं। |
| 2817 | यह संसार नश्वर हैं, अनित्य हैं, नष्ट होने वाला हैं, तो भी लोभी मनुष्य अधर्माचरण में लिप्त रहता हैं चाणक्य ने कहा हैं की शरीर अनित्य हैं ऐसी स्थिति में मनुष्य को यथाशीघ्र धर्म-संग्रह में प्रवर्त हो जाना चाहिए जीवन के उपरान्त धर्म ही मनुष्य का सच्चा मित्र हैं। |
| 2818 | यह सच है कि उद्यमशीलता जोखिम लेने से ही आता है। |
| 2819 | यह सही हैं की सफलता का जश्न आप मनाये पर अपने पुराने बुरे समय को याद रखते हुए। |
| 2820 | यहाँ चाणक्य बन्धु-बान्धवों, मित्रो और परिजनों की पहचान बताते हुए कहते हैं की जब व्यक्ति को कोई असाध्य रोग घेर लेता हैं, जब वह किसी बुरी लत में पड़ जाता हैं अथवा उसे खाने-पीने की चीजो का आभाव हो जाता है, वह अकाल का ग्रास बन जाता है, उस पर किसी प्रकार का शत्रु आक्रमण करता हैं, राजा और सरकार की ओर से उस पर कोई case अथवा अभियोग लगाया जाता हैं और जब वह अपने किसी प्रियजन को उसकी मुर्त्यु पर श्मशान-भूमि ले जाता हैं, ऐसे समय में जो लोग उसका साथ देते हैं, वही वास्तव में उसके बन्धु-बान्धव होते हैं |
| 2821 | यही आप वह पाना चाहते हो जो लोगो के पास नहीं है तो आपको वह करना होगा जिसे लोग नहीं करना चाहते- |
| 2822 | यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यो ही तुम उस कार्य को बंद कर दो, वे तुरंत तुम्हे बदमाश साबित करने में नहीं हिचकिचाएंगे। |
| 2823 | याचक कंजूस-से-कंजूस धनवान को भी नहीं छोड़ते। |
| 2824 | याचकों का अपमान अथवा उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। |
| 2825 | यीशु ने कहा है की एक दूसरे से प्रेम करो। उन्होंने यह नहीं कहा की समस्त संसार से प्रेम करो। |
| 2826 | यीशु समझकर सबकी सेवा कर पाने पर ही विश्व में शान्ति के दवार खुलेंगे |
| 2827 | युग के अंत में सुमेरु पर्वत का चलायमान होना संभव हैं, कल्प के अन्त में सातों समुन्द्रो का अपनी मर्यादा का त्याग संभव हैं, परन्तु सज्जन महात्मा युग-युगान्तर में भी अपनी संकल्प एवम अपनी प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होते वे अपने निश्चय पर सैदव अडिग रहते हैं अत: उनका कथन सैदव विश्वसनीय होता हैं। |
| 2828 | युद्ध मुख्या रूप से भूलों की एक सूची है। |
| 2829 | युद्ध में सत्य इतना कीमती होता है की उसे हमेशा झूठ के बॉडीगॉर्ड के साथ ही होना चाहिये। |
| 2830 | युद्ध असभ्यों का व्यापार है। |
| 2831 | युद्ध किसी भी समस्या का स्थाई हल नहीं है। |
| 2832 | युद्ध जितना पर्याप्त नहीं है, शांति कायम करना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। |
| 2833 | युद्ध में आप एक ही बार मारे जा सकते हैं , लेकिन राजनीति में कई बार। |
| 2834 | युद्ध ही शान्ति है। आज़ादी का मतलब दासता है। अज्ञानता ताकत है। |
| 2835 | युद्ध, किसी भी किसी समस्या का स्थाई हल नहीं होता। |
| 2836 | युवा आसानी से धोखा खाते है क्योंकि वो शीघ्रता से उम्मीद लगाते है। |
| 2837 | युवा उद्यमियों को मेरी सलाह है कि हार स्वीकार ना करें और चुनौतियों और नकारात्मक बलों का पूर्ण आशा और आत्मविश्वास के साथ सामना करें। |
| 2838 | युवाओं के लिए कलाम का विशेष संदेशः अलग ढंग से सोचने का साहस करो, आविष्कार का साहस करो, अज्ञात पथ पर चलने का साहस करो, असंभव को खोजने का साहस करो और समस्याओं को जीतो और सफल बनो। ये वो महान गुण हैं जिनकी दिशा में तुम अवश्य काम करो। |
| 2839 | युवाओं को एक अच्छा वातावरण दीजिये। उन्हें प्रेरित कीजिये। उन्हें जो चाहिए वो सहयोग प्रदान कीजिये। उसमे से हर एक आपार उर्जा का श्रोत है। वो कर दिखायेगा। |
| 2840 | यूं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे पता नही था की, 'कीमत चेहरों की होती है!!' |
| 2841 | यूनीवर्सल एजुकेशन सबसे अधिक नुक्सान पहुंचाने वाला ज़हर है जिसका उदारवाद ने अपने विनाश के लिए आविष्कार किया है। |
| 2842 | ये आठ गुण मनुष्य को यश देने वाले हैं –सद्विवेक, कुलीनता, निग्रह, सत्संग पराक्रम कम बोलना यथाशक्ति दान और कृतज्ञता। |
| 2843 | ये आठो कभी दुसरो का दुःख नहीं समझ सकते। |
| 2844 | ये एक आम कहावत है, और सभी कहते हैं, की ज़िन्दगी केवल कुछ समय के लिए पड़ाव है। |
| 2845 | ये कारण है, ना कि मौत, जो किसी को शहीद बनाता है। |
| 2846 | ये जानने में की जीवन खुद से करने का प्रोजेक्ट है, आधी ज़िन्दगी चली जाती है। |
| 2847 | ये दुनिया बड़ी ही भयानक है, उन लोगो के कारण नहीं जो बुरा करते है बल्कि उन लोगो के कारण जो बुरा होते देखते है और बुरा होने देते है। |
| 2848 | ये बेरहम दुनिया है और इसका सामना करने के लिए तुम्हे भी बेरहम होना होगा। |
| 2849 | ये मत भूलो की धरती तुम्हारे पैरों को महसूस करके खुश होती है और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है। |
| 2850 | ये मायने नहीं रखता की आप दुनिया में कैसे आये, ये मायने रखता है की आप यहाँ हैं. |
| 2851 | ये सचमुच सत्य है कि आप दूसरों को सफल होने में मदद करके सबसे तेजी और अच्छे से सफल हो सकते हैं. |
| 2852 | ये सोच है हम इसांनो की कि एक अकेला क्या कर सकता है पर देख जरा उस सूरज को वो अकेला ही तो चमकता है। |
| 2853 | ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं. हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिले, हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए. |
| 2854 | ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तों.... यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है. |
| 2855 | योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है। |
| 2856 | योग्यता से बिताए हुए जीवन को,हमें वर्षों से नहीं बल्कि कर्मों के पैमाने से तौलना चाहिए। |
| 2857 | यौवन, धन-संपत्ति, अधिकार और स्वामित्व और विवेकहीनता मानव को अनर्थ की ओर प्रेरित करते हैं। इन्हें पाकर मनुष्य को विन्रम और सावधान रहना चाहिए, यदि मनुष्य विवेक का पल्ला छोड़ देता हैं तो उसका विनाश होने में एक पल भी नहीं लगता। |
| 2858 | रचनात्मक (creativity) पर ध्यान दें। जब आप अपने मस्तिष्क का सही उपयोग करते हैं तब आप हकीकत में रचनात्मक बन जाते हैं क्यों कि एकाग्रता से ही रचनात्मक बना जा सकता हैं और ये ही क्वालिटी से आपके दिमाग के सारे बंद दरवाजे खोल देती हैं। |
| 2859 | रत्न कभी खंडित नहीं होता। अर्थात विद्वान व्यक्ति में कोई साधारण दोष होने पर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। |
| 2860 | रत्नों की प्राप्ति बहुत कठिन है। अर्थात श्रेष्ठ नर और नारियों की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है। |
| 2861 | राज अग्नि दूर तक जला देती है। |
| 2862 | राजकुल में सदैव आते-जाते रहना चाहिए। |
| 2863 | राजधन की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहिए। |
| 2864 | राजनीति करना किसी खूबसूरत कला की तरह है। |
| 2865 | राजनीति को विज्ञान कहना बिलकुल सही है। |
| 2866 | राजनीति में कभी पीछे ना हटें, कभी अपने शब्द वापस ना लें…और कभी अपनी गलती ना मानें। |
| 2867 | राजनीति में तब तक किसी बात पर विश्वास मत करिये जब तक उस बात की घोषणा नहीं हो जाती है। |
| 2868 | राजनीति में भाग ना लेने का दंड यह है की आपको अपने से निम्न लोगों द्वारा शासित होना पड़ता है। |
| 2869 | राजनीति में मूर्खता एक बाधा नहीं है। |
| 2870 | राजनीति, आपके चरित्र को तबाह कर सकती है। |
| 2871 | राजपरिवार से द्वेष अथवा भेदभाव नहीं रखना चाहिए। |
| 2872 | राजपुत्रों से नम्रता, पंडितों से मधुर वचन, जुआरियों से असत्य बोलना और स्त्रियों से धूर्तता सीखनी चाहिए। |
| 2873 | राजपुरुषों से संबंध बनाए रखें। |
| 2874 | राजसेवा में डरपोक और निकम्मे लोगों का कोई उपयोग नहीं होता। |
| 2875 | राजहंस दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है दूसरे पक्षी ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार साधारण पुरुष मोह-माया के जाल में फंसकर परमात्मा को नहीं देख सकता। केवल परमहंस जैसा मनुष्य ही माया को छोड़कर परमात्मा के दर्शन पाकर देवी सुख का अनुभव करते हैं। |
| 2876 | राजा अपनी आज्ञा बार-बार नहीं दोहराता वह एक ही बार आज्ञा देता हैं, जो उसके मुख से निकलता हैं वह आदेश होता हैं और उस पर वह स्थिर रहता हैं। पंडित लोग एक बार ही किसी कार्य की पूर्ति के लिए कहते हैं इसी प्रकार माता-पिता अपनी कन्या का विवाह –सम्बन्ध भी एक बार ही स्थिर करते हैं, इस सम्बन्ध में जो बात एक बार निश्चित हो जाती हैं, कन्या उसी की हो जाती हैं इस प्रकार राजा, विद्वान तथा कन्याओ के विवाह–सम्बन्ध आदि के लिए माता-पिता का वचन अटल होता हैं तीनो –राजा, पण्डित तथा माता-पिता द्वारा बोले वचन लौटाए नहीं जाते, अपितु निभाए जाते हैं। |
| 2877 | राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए पाप को, पुरोहित राजा के पाप को, पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए पाप को और गुरु अपने शिष्य के पाप को भोगता है। |
| 2878 | राजा अपने गुप्तचरों द्वारा अपने राज्य में होने वाली दूर की घटनाओ को भी जान लेता है। |
| 2879 | राजा अपने बल-विक्रम से धनी होता है। |
| 2880 | राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य के विभिन्न प्रदेशों में घूम-घूम कर अपनी प्रजा के सम्बन्ध में सब तरह की जानकारी प्राप्त करे, इसी प्रकार जो साधु अथवा योगी पुरुष विभिन्न स्थानों पर घूमते हैं तो लोग उनकी पूजा करते हैं किन्तु बिना कारण इधर-उधर घुमने वाली स्त्री पतन का ही शिकार हो जाती हैं। |
| 2881 | राजा का यह कर्तव्य है की वह अपने राज्य में पाप-कर्म न होने दे उसका यह भी कर्तव्य है की वह अपराधियों और दुष्टो को दंड दे तथा प्रजा को पापकर्म से अलग रखे यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो प्रजा द्वारा किये गए पापकर्मो के लिए उसे ही दोषी ठहराया जायेगा और उसे उन पापो का फल भुगतना होगा। |
| 2882 | राजा की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे। |
| 2883 | राजा की पत्नी, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता (सास) और अपनी जननी ----ये पांच माताएं मानी गई है। इनके साथ मातृवत् व्यवहार ही करना चाहिए। |
| 2884 | राजा की भलाई के लिए ही नीच का साथ करना चाहिए। |
| 2885 | राजा की शक्ति उसके बाहुबल में, ब्राह्मण की शक्ति उसके तत्व ज्ञान में और स्त्रियों की शक्ति उनके सौंदर्य तथा माधुर्य में होती है। |
| 2886 | राजा के दर्शन देने से प्रजा सुखी होती है। |
| 2887 | राजा के दर्शन न देने से प्रजा नष्ट हो जाती है। |
| 2888 | राजा के पास खाली हाथ कभी नहीं जाना चाहिए। |
| 2889 | राजा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए। |
| 2890 | राजा धर्मात्मा होता हैं तो प्रजा भी धार्मिक होती हैं। राजा के पापी होने पर प्रजा में पापाचार फ़ैल जाता हैं और राजा के धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप से उदासीन अथार्त धर्मविमुख हो जाती हैं, यह नियम घर में भी लागु होता हैं घर में भी माँ-बाप जैसे काम करेंगे संतान भी वही करेगी। |
| 2891 | राजा योग्य अर्थात उचित दंड देने वाला हो। |
| 2892 | राजा लोग एक ही बार बोलते है (आज्ञा देते है), पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते है (बार-बार श्लोक नहीं पढ़ते), कन्याएं भी एक ही बार दी जाती है। ये तीन एक ही बार होने से विशेष महत्व रखते है। |
| 2893 | राजा लोग और राजपुरुष महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट राजकीय सेवाओं में कुलीन पुरुषो की नियुक्ति को इसलिए प्राथमिकता देते हैं, क्योकि वे अपने उच्च संस्कारो तथा परंपरागत शिक्षा–दीक्षा के कारण राजा का संग कभी नहीं छोड़ते वे उसकी उन्नति, सामन्य अवस्था और कठिनाई के समय में भी उसका साथ देते है वे हर अवस्था में समान भाव के साथ निभाते हैं वे न कभी अपने स्वामियों को छोड़ते हैं और न ही उन्हें धोखा देते हैं । |
| 2894 | राजा शासन तो करता है, लेकिन हुकूमत नहीं करता है। |
| 2895 | राजा से बड़ा कोई देवता नहीं। |
| 2896 | राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री, इनसे सामान्य व्यवहार करना चाहिए क्योंकि अत्यंत समीप होने पर यह नाश के कारण होते है और दूर रहने पर इनसे कोई फल प्राप्त नहीं होता। |
| 2897 | राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनो का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है। |
| 2898 | राजा, वेश्या, यमराज, अग्नि, चोर, बालक, भिक्षु और आठों गांव का कांटा, ये दूसरे के दुःख को नहीं जानते। |
| 2899 | राजाज्ञा से सदैव डरते रहे। |
| 2900 | राज्य के गठन का हमारा ध्येय सभी का परम आनंद है,किसी श्रेणी विशेष का नहीं। |
Friday, May 13, 2016
#2701-2800
| 2701 | मौत प्रकाश को ख़त्म करना नहीं है; ये सिर्फ दीपक को बुझाना है क्योंकि सुबह हो गयी है। |
| 2702 | मौत से डरो मत, यह आधे-अधूरे जीवन की तुलना में कम भयावह होती है। |
| 2703 | मौत हमारे लिए चिंता का विषय नहीं है क्योकि जब तक हम जीवित है उसका कोई अस्तित्व नहीं है और जब वो आएगी तब हम नहीं रहेंगे। |
| 2704 | मौन सबसे सशक्त भाषण है, धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी। |
| 2705 | मौसम में बदलाव आने के साथ खुद को बदलना सीखे और नई दुनिया बनाएं। |
| 2706 | यज्ञ न करने वाले का वेद पढ़ना व्यर्थ है। बिना दान के यज्ञ करना व्यर्थ है। बिना भाव के सिद्धि नहीं होती इसलिए भाव अर्थात प्रेम ही सब में प्रधान है। |
| 2707 | यथार्थ महापुरुष वह आदमी है जो न दूसरे को अपने अधीन रखता है और न स्वयं दूसरों के अधीन होता है। |
| 2708 | यथार्थ में अच्छा वही है जो उन सब लोगों से मिलकर रहता है जो बुरे समझे जाते हैं। |
| 2709 | यदि आप दृढ संकल्प और पूर्णता के साथ काम करेंगे तो सफलता ज़रूर मिलेगी. |
| 2710 | यदि आप नरक से गुज़र रहे हों तो चलते जाइये। |
| 2711 | यदि आप सचमुच विश्व – स्तरीय होना चाहते हैं – जितने अच्छे हो सकते हैं होना चाहते हैं तो अंतत: ये आपकी तैयारी और अभ्यास पर निर्भर करेगा. |
| 2712 | यदि आपकी कोई विशेष निष्ठा या धर्म है, तो अच्छा है। लेकिन आप उसके बिना भी जी सकते हैं। |
| 2713 | यदि स्वयं में विश्वास करना और अधिक विस्तार से पढाया और अभ्यास कराया गया होता , तो मुझे यकीन है कि बुराइयों और दुःख का एक बहुत बड़ा हिस्सा गायब हो गया होता। |
| 2714 | यदि हम भूत और भविष्य के विवाद में फंसते हैं तो हम पायेंगे कि हमने भविष्य खो दिया है। |
| 2715 | यदि अतिथि नहीं होते तो सब घर कब्र बन जाते। |
| 2716 | यदि आप 100 शेरो की एक सेना बनाते है जिसका सेनापति एक कुत्ता है तो युद्ध में सारे शेर कुत्तों की मौत मारे जाएंगे। लेकिन यदि आप 100 कुत्तों की एक सेना बनाते है जिसका सेनापति एक शेर है तो सारे कुत्ते युद्ध में शेर की तरह लड़ेंगे। |
| 2717 | यदि आप अपनी ड्यूटी को सैल्यूट करोगे तो आपको किसी भी व्यक्ति को सैल्यूट करने की जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन यदि आप अपनी ड्यूटी को पोल्यूट करेंगे तो आपको हर किसी को सैल्यूट करना पडेगा। |
| 2718 | यदि आप अपने सपने पुरे नहीं करोंगे तो कोई और आपको अपने सपने पुरे करने के काम में लगाएगा। |
| 2719 | यदि आप एक अच्छे काठ साज़ बनना चाहते है तो सबसे खराब घोड़े की काठ बनाए ; यदि आप ने उस एक को वश में कर लिया तो आप सब को वश में कर सकते है। |
| 2720 | यदि आप एक बड़ा झूठ बोलते हैं और उसे अक्सर बोलते हैं तो उस पर यकीन कर लिया जायेगा। |
| 2721 | यदि आप एक बार अपने साथी का भरोसा तोड़ दें तो फिर कभी उनका सत्कार और सम्मान नहीं पा सकेंगे। |
| 2722 | यदि आप किसी चीज़ को साधारण तरीके से नहीं समझा सकते है तो इसका मतलब है की आप उसको सही ढंग से नहीं समझ पाए हैं। |
| 2723 | यदि आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करें जो वो समझता है , तो बात उसके सर में जाती है , यदि आप उससे उसकी भाषा में बात करते हैं, तो बात उसके दिल तक जाती है। |
| 2724 | यदि आप केवल मुस्कुराएंगे तो आप पाएंगे की ज़िन्दगी अभी भी मूल्यवान है । |
| 2725 | यदि आप गरीब जन्मे है तो यह आपकी गलती नहीं है लेकिन यदि आप गरीब मरते है तो यह आपकी गलती है। |
| 2726 | यदि आप जीतते है तो आप को कुछ भी एक्सप्लेन करने की जरूरत नहीं होती है लेकिन यदि आप हार जाते है तो आपको वहां एक्सप्लेन करने के लिए नहीं होना चाहिए। |
| 2727 | यदि आप दुसरो को खुश देखना चाहते है तो सहानुभूति को अपनाइये। यदि आप खुश होना चाहते है तो सहानुभूति अपनाइये। |
| 2728 | यदि आप दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो अवश्य करें; यदि नहीं कर सकते हैं तो कम से कम उन्हें नुकसान नही पहुचाइए। |
| 2729 | यदि आप दूसरों को प्रसन्न देखना चाहते हैं तो करुणा का भाव रखें। यदि आप स्वयं प्रसन्न रहना चाहते हैं तो भी करुणा का भाव रखें। |
| 2730 | यदि आप दृढ संकल्प और पूर्णता के साथ काम करेंगे तो सफलता ज़रूर मिलेगी. |
| 2731 | यदि आप दृढ़ संकल्प के साथ और पूर्णता के साथ काम करते हैं, तो सफलता आपका पीछा करेगी। |
| 2732 | यदि आप पागल ही बनना चाहते हैं तो सांसारिक वस्तुओं के लिए मत बनो, बल्कि भगवान के प्यार में पागल बनों। |
| 2733 | यदि आप प्रसन्नतापूर्वक जीना चाहते हो तो इसे एक व्यक्ति या वस्तु के बजाय एक लक्ष्य से बांधो। |
| 2734 | यदि आप रोते हो क्योंकि सूरज आपके जीवन से बाहर चला गया है और आपके आँसू आपको सितारों को देखने के लिए रोकेंगे। |
| 2735 | यदि आप वास्तव में बहुत बारीकी से देखोगे तो आप पाओगे की रातो रात मिलने वाली अधिकतर सफलताओ में बहुत लम्बा वक़्त लगा है। |
| 2736 | यदि आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा। |
| 2737 | यदि आप सौ लोगो को नहीं खिला सकते तो एक को ही खिलाइए। |
| 2738 | यदि आपकी नज़र लाभ पर रहेगी तो आपका ध्यान उत्पाद की गुणवत्ता से हट जायेगा। लेकिन यदि आप एक अच्छा उत्पाद बनाने पर ध्यान लगाओगे तो लाभ अपने आप आपका अनुसरण करेंगा। |
| 2739 | यदि आपको अपने चुने हुए मार्ग पर विश्वास है, इस पर चलने का साहस है और मार्ग की हर कठिनाई को जीतने की शक्ति है; तो आपका सफल होना निश्चित है। |
| 2740 | यदि आपको लगता है कि आप कर सकते हैं - तो आप कर सकते हैं! अगर आपको लगता है कि आप नहीं कर सकते - तो आप नहीं कर सकते दोनों ही सूरतों में आप सही हैं |
| 2741 | यदि आपने अपनी मनोवृतियों पर विजय प्राप्त नहीं की, तो मनोवृत्तियां आप पर विजय प्राप्त कर लेंगी। |
| 2742 | यदि उद्देश्य नेक ना हो तो ज्ञान बुराई बन जाता है। |
| 2743 | यदि एक ही कर्म से समस्त संसार को वश में करना चाहते हो तो पंद्रह मुखों से विचरण करने वाले मन को रोको, अर्थात उसे वश में करो। पंद्रह मुख है ------मुंह, आँख, नाक, कान, जीभ, त्वक, हाथ, पैर, लिंग, गुदा, रस, गंध, स्पर्श और शब्द। |
| 2744 | यदि काम किसी काम के लिए माकूल अवसर, आईडिया या परिस्थियों की प्रतीक्षा कर रहे है तो आप कुछ भी हासिल नहीं कर पायेंगे। |
| 2745 | यदि किसी कार्य के सम्बन्ध में कोई योजना बनाई हो तो उसे वाणी से प्रकट नहीं करना चाहिए अथार्त उसे कार्यरूप में परिणत करने तक गुप्त मात्र के समान सुरक्षित रखना चाहिए। |
| 2746 | यदि किसी को अपने मित्र के रहस्य यानि गुप्तकार्य मालूम हैं तो उन्हें प्रकट नहीं करना चाहिए, इससे कोई लाभ नहीं केवल शत्रुता पैदा होती हैं, जिससे दोनों को हानि होती हैं। |
| 2747 | यदि किसी रहस्य को बनाए रखना चाहते है, तो इसे खुद से भी छुपा कर रखिए। |
| 2748 | यदि कोई अपना पूरा समय मुझमें लगाता है और मेरी शरण में आता है तो उसे अपने शरीर या आत्मा के लिए कोई भय नहीं होना चाहिए. |
| 2749 | यदि कोई दुर्बल मनुष्य अपमान करे तो उसे क्षमा कर दो, क्योंकि क्षमा करना ही वीरो का काम है, परन्तु यदि अपमान करने वाला बलवान हो तो उसको अवश्य दंड दो। |
| 2750 | यदि जनरल मोटर्स कम्प्यूटर इंडस्ट्री के हिसाब से अपनी टेक्नोलॉजी का विकास करता तो आज हम $25 की कार चला रहे होते जो 1000 माईल्स पर गैलन के हिसाब से चलती। |
| 2751 | यदि जन्म-जन्मांतर से प्राणी ने दान देने तथा शास्त्रों के अध्ययन और तप करने का जो अभ्यास किया होता हैं तो नया शरीर मिलने पर उसी अभ्यास के कारण ही वह सत्कर्मो की ओर परवर्त होता हैं। |
| 2752 | यदि तुम अपने अंदर कुछ लिखने की प्रेरणा का अनुभव करो तो तुम्हारे भीतर ये बातें होनी चाहिए- 1. ज्ञान कला का जादू, 2. शब्दों के संगीत का ज्ञान और 3. श्रोताओं को मोह लेने का जादू। |
| 2753 | यदि तुम ईश्वर की दी हुई शक्तियो का सदुपयोग नहीं करोगे तो वह अधिक नहीं देगा। इसलिए प्रयत्न आवश्यक है ईश-कृपा के योग्य बनने के लिए भी पुरुषार्थ चाहिए। |
| 2754 | यदि तुम उड़ नहीं सकते हो तो दौड़ो, यदि तुम दौड़ नहीं सकते हो तो चलो, यदि तुम चल नहीं सकते हो तो रेंगो। लेकिन, तुम जैसे भी करो, तुम्हे आगे बढ़ना ही होगा। |
| 2755 | यदि तुम जाति, देश और व्यक्तिगत पक्षपातों से जरा ऊँचे उठ जाओ तो निःसंदेह तुम देवता के समान बन जाओगे। |
| 2756 | यदि तुम्हारे हाथ रुपए से भरे हुए हैं तो फिर वे परमात्मा की वंदना के लिए कैसे उठ सकते हैं। |
| 2757 | यदि तुम्हारे हृदय में ईर्ष्या, घृणा का ज्वालामुखी धधक रहा है, तो तुम अपने हाथों में फूलों के खिलने की आशा कैसे कर सकते हो? |
| 2758 | यदि परिवार के एक व्यक्ति के बलिदान अथवा परित्याग से कुल की रक्षा होती हैं तो उसके परित्याग में संकोच नहीं करना चाहिए, क्योकि एक से अनेक का महत्व अधिक हैं। यदि पूरे परिवार के त्याग-बलिदान से गाँव की रक्षा होती हैं को कुल के बलिदान में सोच-विचार नहीं करना चाहिए इसी प्रकार यदि अपने बचाव के लिए परिवार के एक व्यक्ति की नहीं, पुरे परिवार की नहीं, गाँव की नहीं अपुतु यदि पुरे संसार की भी बलि देनी पड़े तो निसंकोच दे देनी चाहिए क्योकि अपने के बढ़कर कुछ नहीं। |
| 2759 | यदि पुत्र हो तो पिता का भक्त हो अथार्त माता-पिता के दुखों को दूर करने में जो सहायक होता है, वही पुत्र कहलाने का अधिकारी होता हैं इसी प्रकार संतान का भरण-पोषण करने वाला, उनके सुख-दुःख का ध्यान रखने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थो में पिता कहला सकता हैं। विश्वास करने योग्य व्यक्ति को ही अच्छा मित्र कहा गया है और अपने पति को सुख देने वाली स्त्री को ही सच्चे अर्थो में पत्नी माना गया हैं। |
| 2760 | यदि पुराने आइडिया को भी नए तरीके से पेश कर सके तो इसका मतलब है कि हमारा दिमाग सक्रिय है। |
| 2761 | यदि भगवान जगत के पालनकर्ता है तो हमें जीने की क्या चिंता है? यदि वे रक्षक न होते तो माता के स्तनों से दूध क्यों निकलता? यही बार-बार सोचकर हे लक्ष्मीपति ! अर्थात विष्णु ! मै आपके चरण-कमल में सेवा हेतु समय व्यतीत करना चाहता हूं। |
| 2762 | यदि भारत को एक महान राष्ट्र बनना चाहता है, तो हमें भरोसा करने का साहस होना चाहिए. यह मेरा विश्वास है। |
| 2763 | यदि मद मस्त हाथी अपने माथे से टपकने वाले रस को पीने वाले भौरों को कान हिलाकर उड़ा देता है, तो भौरों का कुछ नहीं जाता, वे कमल से भरे हुए तालाब की ओर ख़ुशी से चले जाते है। हाथी के माथे का श्रृंगार कम हो जाता है उसी प्रकार धनी लोगो को चाहिए कि याचको को निराश न लौटाएं। |
| 2764 | यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो उसकी हर भूल उसे कुछ शिक्षा दे सकती है। |
| 2765 | यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए। |
| 2766 | यदि मानव जीवन को जीवित रखना है तो हमें बिलकुल नयी सोच की आवश्यकता होगी। |
| 2767 | यदि मानवो में पृथ्वी के समान क्षमाशील पुरुष न हो तो मानवों में कभी संधि हो ही नही सकती, क्योंकि झगडे की जड़ तो क्रोध ही है। |
| 2768 | यदि मुक्ति चाहते हो तो समस्त विषय-वासनाओं को विष के समान छोड़ दो और क्षमाशीलता, नम्रता, दया, पवित्रता और सत्यता को अमृत की भांति पियो अर्थात अपनाओ। |
| 2769 | यदि मेहनत करने के बाद भी सपने पुरे न हो तो रास्ता बदलो सिद्धान्त नहीं, क्योंकि वृक्ष भी हमेशा पते बदलते है अपना मूल नही | |
| 2770 | यदि ये सात व्यक्ति – विधार्थी, नौकर, राह चलने वाले मुसाफिर, भूखा, भय से घबराया हुआ, भण्डारी अथार्त भोजन-सामाग्री के संग्रालय का अधिकारी तथा द्वारपाल – सो रहे हो, तो इन्हें निसंकोच भाव से जगा देना चाहिए, क्योकि इनके कर्तव्य-कर्म का निर्वाह इनके जागते रहने में ही है, सोने में नहीं। इनका सोना इनके प्रमाद का सूचक और हानिकारक है। यही कारण है कि इन सोये हुओ को जगाने पर कृतज्ञता मिलती है जगाने वाले को अच्छा ही कहा जायेगा। |
| 2771 | यदि लोगों को पता लग जाए की अपनी कला महारत हासिल करने के लिए मुझे कितनी मेहनत करनी पड़ी है तो उन्हें यह इतनी खूबसूरत नहीं लगेगी। |
| 2772 | यदि विष में भी अमृत की प्राप्ति होती हैं तो उसको ग्रहण कर लेना चाहिए,उसका परित्याग नहीं करना चाहिए इसी प्रकार यही किसी गन्दी जगह सोना आदि मूल्यवान वस्तु पड़ी हो तो उसको उठा लेना चाहिए, अथार्थ यदि किसी नीच व्यक्ति के पास अच्छी विधा हैं अच्छा गुण हैं तो उसको ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए और कोई नीच कुल की शालीन स्त्री अच्छे गुण से युक्त हैं तो उसको ग्रहण करने में कोई हानि नहीं हैं |
| 2773 | यदि व्यक्ति ज्ञान के अनुरूप आचरण नहीं करता तो वह ज्ञान व्यर्थ हैं, अज्ञानी मनुष्य का जीवन व्यर्थ हैं सेनापति के बिना सेना व्यर्थ हैं और पुरुष अथार्थ पति के बिना स्त्री का जीवन व्यर्थ हैं। |
| 2774 | यदि व्यक्ति संसार के सभी प्राणियों के वशीकरण का मंत्र सचमुच में ही जानना चाहता हैं तो एक बड़ा ही सरल और सर्वथा अव्यर्थ जाने वाला उपाय यह हैं कि व्यक्ति को अपनी वाणी को परनिंदा से बचाना चाहिए। दूसरों को अपने वश में करने के इच्छुक व्यक्ति को कभी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। |
| 2775 | यदि शत्रु अपने से अधिक बलवान हो तो उसके साथ विनय और दुष्ट शत्रु को बल–प्रयोग द्वारा वश में किया जाए इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को समय के अनुरूप बल अथवा विनय का प्रयोग करना चाहिए। |
| 2776 | यदि स्त्री सुन्दर हो और घर में लक्ष्मी हो, पुत्र विनम्रता आदि गुणों से युक्त हो और पुत्र का पुत्र घर में हो तो इससे बढ़कर सुख तो इन्द्रलोक में भी नहीं। ऐसी स्थिति में स्वर्ग घर में ही है। |
| 2777 | यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए। |
| 2778 | यदि हम अपने काम में लगे रहे तो हम जो चाहें वो कर सकते हैं. |
| 2779 | यदि हम भूत और भविष्य के विवाद में फंसते है तो हम पाएंगे की हमने भविष्य खो दिया है। |
| 2780 | यदि हम युद्ध को खत्म नहीं करेंगे तो वह हमें खत्म कर देगा। |
| 2781 | यदि हम विश्वास के साथ लड़ते हैं तो हमारी शक्ति दुगनी हो जाती है। |
| 2782 | यदि हम सवतंत्र नहीं है तो कोई भी हमारा आदर नहीं करेगा। |
| 2783 | यदि हम हर वो चीज कर दें जिसके हम सक्षम हैं, तो सचमुच हम खुद को ही चकित कर देंगे। |
| 2784 | यदि हम ज़िन्दगी मिलने से खुश हैं तो मृत्यु के लिए भी शिकायत नहीं करनी चाहिए क्योंकि दोनों देनेवाला तो एक ही है। |
| 2785 | यदि हमारे मन में शांति नहीं है तो इसकी वजह है कि हम यह भूल चुके हैं कि हम एक दुसरे के हैं। |
| 2786 | यद्पि मेरी बुद्धि देववाणी (संस्कृत) में श्रेष्ठ है, तब भी मै दूसरी भाषा का लालची हूं। जैसे अमृत पीने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के ओष्ट रूपी मद्ध को पीने की बनी रहती है। |
| 2787 | यद्यपि आप अल्पमत में हों, पर सच तो सच है। |
| 2788 | यवन से बढ़कर अथार्थ धर्मविरोधी व्यक्ति से बढ़कर संसार में कोई और बड़ा नीच नहीं हैं इसलिए उससे तो सवर्था दूर ही रहना चाहिए। |
| 2789 | यश शरीर को नष्ट नहीं करता। |
| 2790 | यह भगवान से प्रेम का बंधन वास्तव में ऐसा है जो आत्मा को बांधता नहीं है बल्कि प्रभावी ढंग से उसके सारे बंधन तोड़ देता है। |
| 2791 | यह आश्चर्यजनक बात है बहुत से लोगों ने अपने दिमाग से सुव्यस्थित निश्चित रूप से कार्य करने के लिए प्रयास किया हैं। |
| 2792 | यह उचित है की हर व्यक्ति को वह दिया जाये जिसके वो योग्य है। |
| 2793 | यह एक निश्चित तथ्य है कि बहुत से लोगो का समूह ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है, जैसे वर्षा की धार को धारण करने वाले मेघों के जल को तिनको के द्वारा (तिनके का बना छप्पर) ही रोका जा सकता है। |
| 2794 | यह एक रणक्षेत्र है, मेरा शरीर, जिसने बहुत कुछ सहा है. |
| 2795 | यह काम वैसे तो आसन नहीं हैं लेकिन ये है बहुत ही जरुरी, अगर आप बात बात अपना आपा खो देंगे तो लोक-वयवहार में कमी आएगी और आपको अपने लक्ष्य प्राप्त करने में ज्यादा समय लगेगा। |
| 2796 | यह ज़रूरी है कि हम अपना दृष्टिकोण और ह्रदय जितना सभव हो अच्छा करें। इसी से हमारे और अन्य लोगों के जीवन में, अल्पकाल और दीर्घकाल दोनों में ही खुशियाँ आयंगी। |
| 2797 | यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दुसरो के लिए जीते है, वे वास्तव में जीते है। |
| 2798 | यह दुनिया एक किताब की तरह है, जो लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते नहीं है, वह इस किताब का सिर्फ एक ही पन्ना पढ़ते है। |
| 2799 | यह दुनिया खुशियों से भर जाएगी अगर मनुष्य के पास चुप रहने की उतनी ही ताकत हो, जितनी बोलने की है। |
| 2800 | यह नश्वर शरीर जब तक निरोग व स्वस्थ है या जब तक मृत्यु नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपने सभी पुण्य-कर्म कर लेने चाहिए क्योँकि अंत समय आने पर वह क्या कर पाएगा। |
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