| 3201 | शेर से यह बढ़िया बात सीखे कि कार्य छोटा हो या बड़ा उसे पूरा करने के लिए पूरा सामर्थ्य लगा देना चाहिए किसी भी कार्य को महत्वहीन समझना और उसकी उपेक्षा करना अच्छी बात नहीं। |
| 3202 | शौक और दुःख देने वाले बहुत से पुत्रों को पैदा करने से क्या लाभ है ? कुल को आश्रय देने वाला तो एक पुत्र ही सबसे अच्छा होता है। |
| 3203 | श्रदावान और जितेन्द्र्य व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता हैं, ज्ञान प्राप्त करने पर शीघ्र परम शान्ति मिलती हैं। |
| 3204 | श्रद्धा का अर्थ है आत्मविश्वास और आत्मविश्वास का अर्थ है ईश्वर में विश्वास। |
| 3205 | श्रेष्ठ और सुहृदय जन अपने आश्रित के दुःख को अपना ही दुःख समझते है। |
| 3206 | श्रेष्ठ व्यक्ति अपने समान ही दूसरों को मानता है। |
| 3207 | श्रेष्ठ स्त्री के लिए पति ही परमेश्वर है। |
| 3208 | संकट के समय हर छोटी चीज मायने रखती है. |
| 3209 | संकट में बुद्धि ही काम आती है। |
| 3210 | संकोच युवाओं के लिए एक आभूषण है, लेकिन बड़ी उम्र के लोगों के लिए धिक्कार। |
| 3211 | संगठित होने पर क्षुद्र प्राणियों का एक छोटा समूह भी बड़े-बड़े शत्रुओ को पराजीत कर देता हैं। इसके विपरीत बलशाली होने पर भी अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। |
| 3212 | संतान को जन्म देने वाली स्त्री पत्नी कहलाती है। |
| 3213 | संतुष्टि प्रकर्ति की दौलत हैं और वैभव इंसान के द्वारा बनायीं हुई गरीबी वे ही धनवान हैं जो कम में संतुष्टि करना जानते हैं। |
| 3214 | संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहे। |
| 3215 | संधि करने वालो में तेज़ ही संधि का हेतु होता है। |
| 3216 | संपन्न और दयालु स्वामी की ही नौकरी करनी चाहिए। |
| 3217 | संभव की सीमा जानने केवल एक ही तरीका है असम्भव से आगे निकल जाना। |
| 3218 | संयोग भगवान का बचा हुआ गोपनीय रास्ता है। |
| 3219 | संयोग से तो एक कीड़ा भी स्तिथि में परिवर्तन कर देता है। |
| 3220 | संविधान छोटा और अस्पष्ट होना चाहिए। |
| 3221 | संसार का विरोध करके कोई इससे मुक्त नहीं हुआ। बोध से ही इससे ज्ञानीजनों ने पार पाया है। संसार को छोड़ना नहीं, बस समझना है। परमात्मा ने पेड़-पौधे, फल-फूल, नदी, वन, पर्वत, झरने और ना जाने क्या- क्या हमारे लिए नहीं बनाया ? हमारे सुख के लिए, हमारे आनंद के लिए ही तो सबकी रचना की है। |
| 3222 | संसार की निंदा करने वाला अप्रत्यक्ष में भगवान् की ही निंदा कर रहा है। किसी चित्र की निंदा चित्र की नहीं अपितु चित्रकार की ही निंदा तो मानी जाएगी। हर चीज भगवान् की है, कब, कैसे, कहाँ, क्यों और किस निमित्त उसका उपयोग करना है यह समझ में आ जाये तो जीवन को महोत्सव बनने में देर ना लगेगी। |
| 3223 | संसार की प्रत्येक वास्तु नाशवान है। |
| 3224 | संसार के उद्धार के लिए जिन लोगो ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न में भी सुन्दर युवती के कठोर स्तनों और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया, ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है। |
| 3225 | संसार के चारो कोनो में यात्रा कीजियें, लेकिन फिर भी आपको कहीं भी कुछ भी नहीं मिलेगा। जो आप प्राप्त करना चाहते हैं वह तो यही आपके अन्दर विराजमान हैं। |
| 3226 | संसार के विषयों पर ज्ञान, सामान्य रूप से मनुष्य को जिद्दी बना देता हैं, ज्ञान का अभिमान एक बंधन हैं। |
| 3227 | संसार को चलाने के लिए पहले हमें स्वयं को चलना होगा। |
| 3228 | संसार में अत्यंत सरल और सीधा होना भी ठीक नहीं है। वन में जाकर देखो की सीधे वृक्ष ही काटे जाते है और टेढ़े-मेढे वृक्ष यों ही छोड़ दिए जाते है। |
| 3229 | संसार में आजतक कोई भी व्यक्ति धन, जीवन, स्त्रियों तथा खाने-पीने के उत्तम पदार्थों से न तो तृप्त हुआ हैं। और न ही होगा और न हो रहा हैं भूतकाल में इन विषयों में सभी प्राणी अतृप्त होकर ही गए हैं। और वर्तमान में भी अतृप्त ही दिखाई देते हैं तथा भविष्य में भी यहीं स्थिति बनी रहेगी। |
| 3230 | संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके वंश में कोई न कोई दोष, या अवगुण न हो, कहीं न कहीं कोई दोष निकल ही आता हैं। संसार में कोई ऐसा प्राणी भी नहीं है जो कभी न कभी, किसी न किसी रोग से पीड़ित न हुआ हो, अथार्त रोग कभी न कभी सभी मनुष्यों को घेर ही लेता हैं। संसार में ऐसा कौन व्यक्ति हैं जिसे कोई न कोई व्यसन न हो अथार्त जब वह संकट में न पड़ा हो संसार में किसी को लगातार सुख भी नहीं मिलता, कभी न कभी कोई संकट अथवा कष्ट आ ही जाता हैं। |
| 3231 | संसार में ऐसे अपराध कम ही है जिन्हे हम चाहे और क्षमा न कर सके। |
| 3232 | संसार में कुछ दुःख ऐसे हैं जिन्हें मुनष्य अपने जीवन में सरलतापूर्वक न भुला पता हैं और न उन्हें सहन कर सकता हैं ये दुःख हैं – अपनी पत्नी से अलग होना, अपने परिवार वालें और सम्बन्धियों से अपमानित होना, क़र्ज़ का न चूका पाना, दुष्ट स्वामी की नौकरी करना तथा दरिद्र बन कर मूर्खो के समाज में रहना। |
| 3233 | संसार में केवल दो तत्व हैं- एक सौंदर्य और दूसरा सत्य। सौंदर्य प्रेम करने वालों के हृदय में है और सत्य किसान की भुजाओं में। |
| 3234 | संसार में जिसके पास धन है, उसी के सब मित्र होते है, उसी के सब बंधु-बांधव होते है, वहीं श्रेष्ठ पुरुष गिना जाता है और वही ठाठ-बाट से जीता है। |
| 3235 | संसार में निर्धन व्यक्ति का आना उसे दुखी करता है। |
| 3236 | संसार में प्रत्येक कार्य, प्रत्येक गुण, प्रत्येक बात की एक सीमा होती हैं प्रत्येक अच्छी-बुरी वस्तु अपनी सीमा में ही शोभा देती हैं जहां सीमा का अतिक्रमण होता हैं वहा अति करने वाले को दुर्गति का शिकार होता पड़ता हैं इसीलिए आचार्य ने कहा हैं कि अति का तो सभी जगह से परित्याग कर देना चाहिए। |
| 3237 | संसार में मानव के लिए क्षमा एक अलंकार है। |
| 3238 | संसार में लोग जान-बूझकर अपराध की ओर प्रवर्त्त होते हैं। |
| 3239 | संसार में विद्वान की ही प्रशंसा होती है, विद्वान व्यक्ति ही सभी जगह पूजे जाते है। विद्या से ही सब कुछ मिलता है, विद्या की सब जगह पूजा होती है। |
| 3240 | संस्कृति मन और आत्मा का विस्तार है. |
| 3241 | सकारात्मक सोच (पॉजिटिव थिंकिंग) के साथ सकारात्मक किर्या (पॉजिटिव एक्शन) का परिणाम सफलता है। |
| 3242 | सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति को वहां भी रोशनी दिखाई देती है जहां रोशनी का का कोई स्त्रोत नहीं होता है। लेकिन जाने क्यों एक नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हमेशा उस रोशनी को रोकने के लिए भागता है। |
| 3243 | सच और समय का गहरा नाता है। दोनों बातों को अपने जीवन में उतारने को लेकर कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। |
| 3244 | सच कहूँ तो मैं कभी आइकन , सुपरस्टार , इत्यदि विश्लेषणों के चक्कर में नहीं पड़ा. मैं हमेशा खुद को एक अभिनेता के रूप में देखता हूँ जो अपनी काबीलियत के अनुसार जितना अच्छा कर सकता है कर रहा है. |
| 3245 | सच में हंसने के लिए आपको अपनी पीड़ा के साथ खेलने में सक्षम होना चाहिए। |
| 3246 | सच्चा काम अहंकार और स्वार्थ को छोड़े बिना नहीं होता। |
| 3247 | सच्चा ज्ञान केवल यह जानने में है की आप कुछ नहीं जानते है। |
| 3248 | सच्चा ज्ञान दृढ़ संकल्प है। |
| 3249 | सच्चाई तक पहुंचने के लिए सबसे पहले उस बात पर विश्वास मत करिए, उससे मुंह फेरिए और उस पर विश्वास भी मत करिए। |
| 3250 | सच्ची सफलता और आनंद का सबसे बड़ा रहस्य यह है वह पुरुष या स्त्री जो बदले में कुछ नहीं मांगता , पूर्ण रूप से निस्स्वार्थ व्यक्ति , सबसे सफल है। |
| 3251 | सच्ची आध्यात्मिकता, जिसकी शिक्षा हमारे पवित्र ग्रंथो में दी हुई है, वह शक्ति है, जो अंदर और बाहर के पारस्परिक शांतिपूर्ण संतुलन से निर्मित होती है। |
| 3252 | सच्ची क्षमा तब है जब आप कह सके – उन सारे अनुभवों के लिए धन्यवाद। |
| 3253 | सच्ची बुद्धिमानी उसी वक्त आ सकती हैं, जब हम यह मान ले कि हम जिन्दगी खुद के बारे में और हमारे आस-पास कि दुनिया के बारें में कितना कम जानते हैं कुछ ही जानते हैं। |
| 3254 | सच्ची शिक्षा का लक्ष्य चरित्र के साथ बुद्धिमता का विकास करना है। पूरी एकाग्रता से विचार करने की क्षमता देना ही शिक्षा का कार्य है। |
| 3255 | सच्ची ख़ुशी कैंसर को हराने से या चाँद-सितारों की चढ़ाई करने से नहीं होगी, लेकिन पुरानी सभ्यता को महफूज रखने से अद्भुत ख़ुशी का अनुभव जरुरु होगा। |
| 3256 | सच्चे दोस्त से तुलना करना मुश्किल है। |
| 3257 | सच्चे लोगो के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं। |
| 3258 | सज्जन की राय का उल्लंघन न करें। |
| 3259 | सज्जन को बुरा आचरण नहीं करना चाहिए। |
| 3260 | सज्जन तिल बराबर उपकार को भी पर्वत के समान बड़ा मानकर चलता है। |
| 3261 | सज्जन थोड़े-से उपकार के बदले बड़ा उपकार करने की इच्छा से सोता भी नहीं। |
| 3262 | सज्जन दुर्जनों में विचरण नही करते। |
| 3263 | सत वाणी से स्वर्ग प्राप्त होता है। |
| 3264 | सतत प्रयास – न कि ताकत या बुद्धिमानी – ही हमारे सामर्थ्य को साकार करने की कुंजी है। |
| 3265 | सत्य एक विशाल वृक्ष है, उसकी ज्यों-ज्यों सेवा की जाती है, त्यों-त्यों उसमे अनेक फल आते हुए नजर आते है, उनका अंत ही नहीं होता। |
| 3266 | सत्य एक है, मार्ग कई। |
| 3267 | सत्य और ज्ञान की खोज में लगे रहना ही किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी विशेषता हो सकती है। |
| 3268 | सत्य और तथ्य में बहुत बड़ा अंतर है. तथ्य सत्य को छिपा सकते हैं. |
| 3269 | सत्य कभी ऐसे कारण को क्षति नहीं पहुंचाता जो उचित हो। |
| 3270 | सत्य का क्रियान्वन ही न्याय है। |
| 3271 | सत्य की कोई भाषा नहीं है। भाषा सिर्फ मनुष्य का निर्माण है। लेकिन सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है। सत्य को बनाना या प्रमाणित नहिं करना पड़ता, सिर्फ़ उघाड़ना पड़ता है। |
| 3272 | सत्य की खोज इसे पाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। |
| 3273 | सत्य की परिभाषा क्या है ? सत्य की इतनी ही परिभाषा है की जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा। |
| 3274 | सत्य के मार्ग पे चलते हुए कोई दो ही गलतियाँ कर सकता है; पूरा रास्ता ना तय करना, और इसकी शुरआत ही ना करना। |
| 3275 | सत्य को जानना चाहिए पर उसको कहना कभी-कभी चाहिए। |
| 3276 | सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। |
| 3277 | सत्य पर पृथ्वी टिकी है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु बहती है, संसार के सभी पदार्थ सत्य में निहित है। |
| 3278 | सत्य पर संसार टिका हुआ है। |
| 3279 | सत्य पर ही देवताओं का आशीर्वाद बरसता है। |
| 3280 | सत्य बताते समय बहुत ही एक्राग और नम्र होना चाहिए क्योकि सत्य के माध्यम से भगवान का अहसास किया जा सकता हैं। |
| 3281 | सत्य बिना जन समर्थन के भी खड़ा रहता है, वह आत्मनिर्भर है। |
| 3282 | सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए। |
| 3283 | सत्य मेरी माता है, पिता मेरा ज्ञान है, धर्म मेरा भाई है, दया मेरी मित्र है, शांति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है, ये छः मेरे बंधु-बांधव है। |
| 3284 | सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं। |
| 3285 | सत्य से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। |
| 3286 | सत्संग से स्वर्ग में रहने का सुख मिलता है। |
| 3287 | सदा सांसारिक कार्यो में व्यस्त रहने वाला, पशुओ का पालक, व्यापार तथा कृषि-कर्म से अपनी आजीविका चलाने वाला ब्राह्मण, ब्राह्मण –कुल में उत्पन्न होकर भी वैश्य कहलाता हैं। |
| 3288 | सदाचार से मनुष्य का यश और आयु दोनों बढ़ती है। |
| 3289 | सदैव आर्यों (श्रेष्ठ जन) के समान ही आचरण करना चाहिए। |
| 3290 | सपना वो नहीं है जो आप नींद में देखे, सपने वो है जो आपको नींद ही नहीं आने दे। |
| 3291 | सपने के बारे में ध्यान से सोचे। सुबह उठ कर सबसे पहले अपने उस सपने के बारे में सोचे, जो आपने जागने से पहले देखा था उससे आपको एक अदभुद शक्ति प्राप्त होगी फिर उनकी व्याख्या करे यदि वह आपको अच्छा लगे, तब उस पर काम करना शुरू कर दे फिर आपका वह सपना हकीकत में बदलना शुरू हो जायेगा। |
| 3292 | सपने वो नहीं जो आप सोते समय देखते हो, सपने वो है जो आपको सोने नहीं देते। |
| 3293 | सफर करने का मतलब दूसरी दुनिया के लोगो से मिलना और उनके जैसे बनना है। |
| 3294 | सफल लोग और अधिक सफल होते हैं क्योकि वो सीक्रेट ऑफ़ सक्सेस / Secrets of success जानते हैं जबकि दुसरे लोग असफल हो जाते हैं और फिर उनकी स्थिति उस मकड़ी के समान हो जाती हैं, जो एक हवा के झोकें से नीचे गिर पड़ती हैं। |
| 3295 | सफल लोग सफलता के लिए सिर्फ काम और मेहनत ही नहीं करते हैं बल्कि उनका आकलन (Work evaluation) भी करते हैं वे अपने कामों को लगातार जांचते रहते हैं दूसरों से Advice भी लेते हैं इस तरह से उनको पता रहता की आगे क्या करना हैं और कहाँ गलती हुई हैं जब तक आप अपने काम की जांच और आकलन नहीं कर लेते, आप उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। |
| 3296 | सफल व्यक्ति वही है जो बगुले के समान अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखकर अपना शिकार करता है। उसी के अनुसार देश, काल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर सभी कार्यो को करना चाहिए। बगुले से यह एक गुण ग्रहण करना चाहिए, अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करे तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी, अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की और लगाना चाहिए, तभी सफलता मिलेगी। |
| 3297 | सफलता अंत नहीं है , असफलता घातक नहीं है! लगे रहने का साहस ही मायने रखता है। |
| 3298 | सफलता की ख़ुशी मानना अच्छा है पर उससे ज़रूरी है अपनी असफलता से सीख लेना . |
| 3299 | सफलता एक ऐसी चीज हैं जिसे हर एक व्यक्ति पाना चाहता हैं, लोग कैसे एक के बाद एक सफलता हासिल करते जातें हैं? वो ऐसा क्या अलग करते हैं, क्या आपने कभी जाना, वो सब भी प्रकृति द्वारा निर्मित मनुष्य हैं आइयें जानते हैं और आप कैसे उनसे प्रेरणा ले सकते हैं? |
| 3300 | सफलता एक घटिया शिक्षक है। यह लोगों में यह सोच विकसित कर देता है कि वो असफल नहीं हो सकते। |
Thursday, July 7, 2016
#3201-3300
Wednesday, July 6, 2016
#3101-3200
| 3101 | व्यक्ति को उचित समय पर ही बोलना चाहिए। वसन्त में फैलने वाली आम्र्मंज़री के स्वाद से प्राणिमात्र को आनन्दित करने वाली कोयल की वाणी जब तक सुमधुर और कर्णप्रिय नहीं हो जाती, तब तक कोयल मौन रहकर ही अपने दिन बिताती हैं। |
| 3102 | व्यक्ति को उट-पटांग अथवा गवार वेशभूषा धारण नहीं करनी चाहिए। |
| 3103 | व्यक्ति को किसी संकट से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए धन जमा करना चाहिए, क्योंकि धन अथवा लक्ष्मी को चंचल माना गया है उसके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि वह कब नष्ट हो जायेगी, परन्तु प्रारंभ की बात पर यह प्रश्न उठता हैं कि यदि आदमी विपति के लिए धन का संचय करता हैं, दुःख से बचने के लिए धन बचाता है तो उसे दुःख प्राप्त होने की संभावना ही कहां रह जाती हैं |
| 3104 | व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी स्त्री से ही सन्तोष करे, इसी प्रकार उसे अपने भोजन से भी सन्तोष करना चाहिए तथा आजीविका से प्राप्त धन में भी आदमी को सन्तोष करना चाहिए, इसके विपरीत शास्त्रों के अध्ययन, प्रभु के नाम का स्मरण और दान-कार्य में कभी सन्तोष नहीं करना चाहिए, ये तीनो अधिक से अधिक करने की इच्छा करनी चाहिए। |
| 3105 | व्यक्ति को जो करना है, वह करना ही चाहिये चाहे इसके व्यक्तिगत नतीजे कुछ भी क्यों न हो। बाधाए हो, खतरे हों या दबाव पड़ रहा हो और यही मानवीय नैतिकता का आधार है। |
| 3106 | व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ न कुछ स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। आचर्य का कहना हैं की मनुष्य को चाहिए के वह प्रतिदिन शास्त्र कम-से-कम एक श्लोक पढ़े व उसका अर्थ समझे यदि उसके पास समय नहीं हैं तो पूरा श्लोक न पढ़कर आधा अथवा आधे से आधे श्लोक का ही अध्यन करके अपने दिन को सार्थक बनाये, जो व्यक्ति दिन-भर में किसी शास्त्र अथवा उत्तम पुस्तक का एक अक्षर भी नहीं पढता उस व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि उसके जीवन का वह दिन निरर्थक हो गया। इसके अतिरिक्त आचार्य के अनुसार दिन को सार्थक करने का दूसरा उपाय दान करना हैं। |
| 3107 | व्यक्ति को राजपुत्रो से विनयशीलता और नम्रता की, पण्डितो से बोलने के उत्तम ढंग की, जुआरियो से असत्य-भाषण के रूप-भेदों की तथा स्त्रियों से छल-कपट की शिक्षा लेनी चाहिए। |
| 3108 | व्यक्ति जब तक व्यक्तिगत चिन्ताओ के दायरे से ऊपर उठकर पूरी मानवता की वृहद चिंताओं के बारे में नहीं सोचता तब तक उसने जिंदगी जीना ही शुरू नहीं किया है। |
| 3109 | व्यक्ति दुसरो पर राज करना चाहता है वह कभी राज नहीं कर सकता। वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति किसी को पढ़ाने का दबाव महसूस करके अच्छा शिक्षक नहीं बन सकता है। |
| 3110 | व्यक्ति संसार में अकेला ही जन्म लेता हैं तथा अकेला ही मरता हैं उसके द्वारा कमाई हुई धन-सम्पति, भाई बन्धु सब यही रह जाते हैं इस संसार में न कोई किसी के साथ आता हैं और न ही किसी के साथ जाता हैं भला-बुरा सब-कुछ व्यक्ति को अपने आप भुगतना पड़ता हैं इसमें कोई किसी का साथ नहीं देता। |
| 3111 | व्यक्ति स्वयं अच्छे बुरे काम करता हैं, इसलिए उसे अच्छे बुरे कर्म भी खुद भुगतने पड़ते हैं वह संसार के मोह-मायाजाल में स्वयं ही फँसता हैं और उससे मुक्त भी स्वयं ही होता हैं। |
| 3112 | व्यक्तिगत ख़ुशी के दिन बीत चुके हैं। |
| 3113 | व्यक्तित्व सुनने या देखने से नहीं बनता, मेहनत और काम करने से बनता है। |
| 3114 | व्यवस्तिथ ज्ञान का अभाव साहितियक महत्वाकांक्षा को जितना निष्फल बनाता है उतनी कोई और चीज़ नहीं बनाती। |
| 3115 | व्यवहार मीठा ना हों तो हिचकियाँ भी नहीं आती, बोल मीठे न हों तो कीमती मोबाईलो पर घन्टियां भी नहीं आती। घर बड़ा हो या छोटा, अग़र मिठास ना हो, तो ईंसान तो क्या, चींटियां भी नजदीक नहीं आती। |
| 3116 | व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। |
| 3117 | व्यसनी व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही रुक जाता है। |
| 3118 | व्यस्त होने का मतलब हमेशा हकीकत में काम होना नहीं है। सभी काम का एक ही मकसद होता हैं उत्पादन या उपलब्धि, और यह परिणाम प्राप्त करने के लिए व्यक्ति में पूर्वविवेक, सिद्धि और व्यवस्था, योजना, बुद्धि, और ईमानदार उद्देश्य, होना चाहिए। केवल प्रतीत होने के लिए कार्य करना कार्य नहीं कहलाता हैं। |
| 3119 | व्यस्त ज़िन्दगी प्रार्थना को कठिन बनाती है, मगर प्रार्थना कठिन ज़िन्दगी को आसान बनाती है |
| 3120 | व्याकुलता असंतोष है और असंतोष प्रगति की पहली आवश्यकता है। आप मुझे कोई पूर्ण रूप से संतुष्ट व्यक्ति दिखाइए और मैं उस व्यक्ति में आपको एक असफल व्यक्ति दिखा दूंगा। |
| 3121 | व्यापार का व्यापार सम्बन्ध हैं ; जीवन का व्यपार मानवीय लगाव है. |
| 3122 | व्यापार, कुछ नियमो आर बहुत सारे जोखिम के साथ एक पैसों का खेल (मनी गेम) है। |
| 3123 | शक की आदत से भयावह कुछ भी नहीं है। शक लोगों को अलग करता है. यह एक ऐसा ज़हर है जो मित्रता ख़तम करता है और अच्छे रिश्तों को तोड़ता है। यह एक काँटा है जो चोटिल करता है, एक तलवार है जो वध करती है। |
| 3124 | शक्ति जीवन है , निर्बलता मृत्यु है . विस्तार जीवन है , संकुचन मृत्यु है . प्रेम जीवन है , द्वेष मृत्यु है। |
| 3125 | शक्ति बचाव में नहीं आक्रमण में निहित है। |
| 3126 | शक्ति या बुद्धिमता से नही, सतत प्रयासों से ही हमारी क्षमताए सामने आती है। |
| 3127 | शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। |
| 3128 | शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे। |
| 3129 | शक्तिहीन को बलवान का आश्रय लेना चाहिए। |
| 3130 | शक्तिहीन पुरुष प्रायः ब्रह्मचारी बन जाता हैं और निर्धन और आजीविका कमाने में अयोग्य व्यक्ति साधू बन जाता हैं। उसी प्रकार असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति देवों का भक्त बन जाता हैं और बूढी स्त्री पतिव्रता बन जाती हैं। |
| 3131 | शक्तिहीन मनुष्य साधु होता है, धनहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी होता है,रोगी व्यक्ति देवभक्त और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता होती है। |
| 3132 | शत्रु के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए। |
| 3133 | शत्रु का पुत्र यदि मित्र है तो उसकी रक्षा करनी चाहिए। |
| 3134 | शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें। |
| 3135 | शत्रु की निंदा सभा के मध्य नहीं करनी चाहिए। |
| 3136 | शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए। |
| 3137 | शत्रु के साथ आपको शांति अगर चाहिए, तो आपको अपने शत्रु के साथ काम करना होगा। फिर वह आपका साथी बन जाएगा। |
| 3138 | शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है। |
| 3139 | शत्रु द्वारा किया गया स्नेहिल व्यवहार भी दोषयुक्त समझना चाहिए। |
| 3140 | शत्रु भी उत्साही व्यक्ति के वश में हो जाता है। |
| 3141 | शत्रुओ से द्वेष बनाये रखने से प्राणों के साथ धन का भी नाश होता हैं, राजा तथा राजपरिवार से शत्रुता करने से सर्वस्व अथार्थ धन-सम्मान तथा प्राण का नाश होता हैं। और ब्राह्मणों से द्वेष करने से प्राण, धन-सम्मान के साथ पूरे वंश का नाश हो जाता हैं। |
| 3142 | शत्रुओं को मित्र बना कर क्या मैं उन्हें नष्ट नहीं कर रहा ? |
| 3143 | शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें। |
| 3144 | शब्द अज्ञात क्षेत्रों में पुल का निर्माण करते हैं। |
| 3145 | शब्द मौन से ज्यादा कीमती हों नहीं तो चुप रहना ही बेहतर। |
| 3146 | शब्दों की बजाय मन को पढ़ने की कोशिश कीजिए, क्योंकि कलम दिल की भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकता। |
| 3147 | शराबी व्यक्ति का कोई कार्य पूरा नहीं होता है। |
| 3148 | शरीर अपनी असंख्य कोशिकाओं या निवासियों से बना एक समुदाय है। |
| 3149 | शरीर का सबसे मुख्य कार्य मस्तिष्क को इधर-उधर ले जाना है। |
| 3150 | शरीर की बजाए अपनी आत्मा को मजबूत बनाइए। |
| 3151 | शरीर के लिए सबसे अच्छा इलाज़ एक शांत मन है। |
| 3152 | शरीर को पहुचने वाले कष्ट को ही सबसे बड़ा दर्द माना जाता है। |
| 3153 | शरीर में तेल लगाने पर, चिता का धुआं लगने पर, स्त्री संभोग करने पर, बाल कटवाने पर, मनुष्य तब तक चांडाल, अर्थात अशुद्ध ही रहता है, जब तक वह स्नान नहीं कर लेता। |
| 3154 | शर्म की अमीरी से इज्जत की गरीबी अच्छी है। |
| 3155 | शांत चित्त वाले संतोषी व्यक्ति को संतोष रुपी अमृत से जो सुख प्राप्त होता है, वह इधर-उधर भटकने वाले धन लोभियों को नहीं होता। |
| 3156 | शांत व्यक्ति सबको अपना बना लेता है। |
| 3157 | शांति और आत्म-नियंत्रण अहिंसा है। |
| 3158 | शांति का कोई रास्ता नहीं है, केवल शांति है। |
| 3159 | शांति की शुरुआत मुस्कराहट से होती है। |
| 3160 | शांति के बराबर दूसरा तप नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है। |
| 3161 | शांति जोर डालकर प्राप्त नहीं की जा सकती, सिर्फ समझकर प्राप्त की जा सकती है। |
| 3162 | शांति मन के अन्दर से आती है, इसके बिना इसकी तलाश मत करो। |
| 3163 | शांति शक्ति के द्वारा नहीं रखी जा सकती है। यह केवल समझ से प्राप्त की जा सकती है। |
| 3164 | शांतिपूर्ण देश में ही रहें। |
| 3165 | शादी ना तो स्वर्ग है ना नर्क है यह तो केवल यातना है। |
| 3166 | शादी या ब्रह्मचर्य, आदमी चाहे जो भी रास्ता चुन ले, उसे बाद में पछताना ही पड़ता है। |
| 3167 | शान्ति अथार्थ आवेग-उद्वेग पर काबू पाने के समान दूसरा कोई उत्कष्ट तप नहीं, सन्तोष अथार्थ सहज में प्राप्त वस्तु से प्रसन्नता जैसा कोई दूसरा सुख नहीं, तृष्णा अथार्थ अधिक से अधिक पाने से चाह जैसा दूसरा कोई घटिया और दुःख देने वाला रोग नहीं तथा दया अथार्थ दूसरों के दुःख से द्रवित होने जैसा कोई बढ़िया दूसरा कोई धर्मं नहीं। |
| 3168 | शायद ही कोई व्यक्ति एक साथ दो कलाओं या व्य्वसाओं को करने की क़ाबिलियत रखता हो। |
| 3169 | शारीरिक , बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कुछ भी आपको कमजोर बनाता है - , उसे ज़हर की तरह त्याग दो। |
| 3170 | शारीरिक उपवास के साथ-साथ मन का उपवास न हो तो वह दम्भपूर्ण और हानिकारक हो सकता है। |
| 3171 | शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए। |
| 3172 | शास्त्र का ज्ञान आलसी को नहीं हो सकता। |
| 3173 | शास्त्र शिष्टाचार से बड़ा नहीं है। |
| 3174 | शास्त्रों का अंत नहीं है, विद्याएं बहुत है, जीवन छोटा है, विघ्न-बाधाएं अनेक है। अतः जो सार तत्व है, उसे ग्रहण करना चाहिए, जैसे हंस जल के बीच से दूध को पी लेता है। |
| 3175 | शास्त्रों के ज्ञान से इन्द्रियों को वश में किया जा सकता है। |
| 3176 | शास्त्रों के न जानने पर श्रेष्ठ पुरुषों के आचरणों के अनुसार आचरण करें। |
| 3177 | शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है। |
| 3178 | शिक्षा एक लौ जलाने के समान है नाकि एक बहुत बड़ा बरतन भरने के समान। |
| 3179 | शिक्षा ऐसी चीज़ है जो कभी खत्म नहीं होती है। यह बढ़ती जाती है। |
| 3180 | शिक्षा तेज़ धार वाले हथियार की तरह है। इसका नतीजा क्या होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसने इसे अपने हाथ में पकड़ा है और निशाना किस पर है। |
| 3181 | शिक्षा बहुत ही आवश्यक चीज हैं अगर यह आवश्यक नहीं होती तो मैं मेरे बेटो को शिक्षा नहीं दिलवाता मुझे कठिन मार्ग पता हैं, लेकिन शिक्षित व्यक्ति उसी काम को जल्दी और अच्छा कर सकता हैं बिना कठिनाई के। |
| 3182 | शिक्षा बुढ़ापे के लिए सबसे अच्छा प्रावधान है। |
| 3183 | शिक्षा भीतर से आती है, आप इसे संघर्ष, प्रयास और विचारों से पाते हैं। |
| 3184 | शिक्षा वो है जो आपको तब भी याद रहे जब आप सब कुछ भूल गए हो जो आपको याद था। |
| 3185 | शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है.एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पता है. शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है. |
| 3186 | शिक्षा सबसे मत्वपूर्ण हथियार है। क्योंकि इसी से ही दुनिया बदली जा सकती है। |
| 3187 | शिक्षाविद को छात्रों में रचनात्मकता, जानने की भावना और नैतिक नेतृत्व की क्षमता का निर्माण कर उनका आदर्श बन जाना चाहिए। |
| 3188 | शिक्षित और अशिक्षित में उतना ही फर्क है जितना की ज़िन्दगी और मौत में। |
| 3189 | शिक्षित मन की यह पहचान है की वो किसी भी विचार को स्वीकार किए बिना उसके साथ सहज रहे। |
| 3190 | शिखर पर पहुँचने के लिए सामर्थ्य चाहिए। फिर वो चाहे माउंट एवेरेस्ट का शिखर हो या आपके केरियर का। |
| 3191 | शिष्य को गुरु के वश में होकर कार्य करना चाहिए। |
| 3192 | शीशा मेरा सबसे अच्छा मित्र है क्योंकि जब मै रोता हूं तो वह कभी नहीं हँसता। |
| 3193 | शुक्रगुजार हूँ उन तमाम लोगो का जिन्होने बुरे वक्त मे मेरा साथ छोङ दिया क्योकि उन्हे भरोसा था कि मै मुसीबतो से अकेले ही निपट सकता हूँ। |
| 3194 | शुद्ध किया हुआ नीम भी आम नहीं बन सकता। |
| 3195 | शुद्ध ज्ञान और शुद्ध प्रेम एक ही चीज हैं। ज्ञान और प्रेम से जिस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता हैं वो एक ही हैं और इसमें भी प्रेम वाला रास्ता ज्यादा आसान है। |
| 3196 | शुभ एवं स्वस्थ विचारो वाला ही सम्पूर्ण स्वस्थ प्राणी है। |
| 3197 | शून्य ह्रदय पर कोई उपदेश लागू नहीं होता। जैसे मलयाचल के सम्बन्ध से बांस चंदन का वृक्ष नहीं बनता। |
| 3198 | शेर और बगुले से एक-एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पांच और कुत्ते से छः गुण (मनुष्य को) सीखने चाहिए। |
| 3199 | शेर दिन में 20 घन्टे सोता है अगर मेहनत सफलता की कुंजी होती तो गधे जंगल के राजा होते। |
| 3200 | शेर द्वारा संचालित भेड़ों की सेना, भेड़ द्वारा संचालित शेरो की सेना से हमेशा जीतेगी। |
Tuesday, July 5, 2016
#3001-3100
| 3001 | विजेता बोलते है की मुझे कुछ करना चाहिए जबकि हारने वाले बोलते है की कुछ होना चाहिए। |
| 3002 | विजेता से कभी नहीं पूछा जायेगा कि क्या उसने सच कहा था। |
| 3003 | विज्ञान, धारणा के अलावा कुछ नहीं है। |
| 3004 | विदयार्थी को यदि सुख की इच्छा है और वह परिश्रम करना नहीं चाहता तो उसे विदया प्राप्त करने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। यदि वह विदया चाहता है तो उसे सुख-सुविधाओं का त्याग करना होगा क्योंकि सुख चाहने वाला विदया प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरी ओर विदया प्राप्त करने वालो को आराम नहीं मिल सकता। |
| 3005 | विदेश में रहने वाले व्यक्तियों का सच्चा मित्र उनकी विद्या होती हैं, अपने घर में रहने वाले के लिए उसका सच्चा मित्र उसकी पतिव्रता स्त्री होती हैं, रोगी व्यक्ति के लिए उसका मित्र औषधि होती हैं और मृतु-शैया पर पड़े व्यक्ति का मित्र उसका धर्म और जीवन मैं किये गए सत्कर्म हैं। |
| 3006 | विदेश में विध्या ही मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र है और मरते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते है। |
| 3007 | विद्या ही निर्धन का धन है। |
| 3008 | विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता। |
| 3009 | विद्या से विद्वान की ख्याति होती है। |
| 3010 | विद्याविहीन अर्थात मूर्ख व्यक्तियों के बड़े कुल के होने से क्या लाभ ? विद्वान व्यक्ति का नीच कुल भी देवगणों से सम्मान पाता है। |
| 3011 | विद्रोह करने के बाद ही जागरूकता का जन्म होता है। |
| 3012 | विद्वान और प्रबुद्ध व्यक्ति समाज के रत्न है। |
| 3013 | विद्वान व्यक्ति को गधे से निम्नोक्त , तीन गुण सीखने चाहिए - 1 . अत्यधिक थका होने पर भी बोझा ढोते रहना चाहिए अर्थात अपने कर्तव्य पथ से विमुख नही होना चाहिए ।(2) कार्यसाधन मे , सर्दी की परवाह नही करनी तथा (3) सर्वदा सन्तुष्ट रहकर विचरना चाहिए अर्थात फल की चिंता न करके कर्म करने से ही सम्बन्ध रखना चाहिए ।सुश्रान्तोऽपि वेहद् भारं शीतोष्ण च न पश्यति । सन्तुष्टश्चरति नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात् ।। |
| 3014 | विधा को मनचाहा फल देने वाली कामधेनु गाय के समान बताया गया हैं जिस प्रकार वशिषठ जी की कामधेनु उसकी सभी इच्छाएं पूरी कर देती थी, उसी प्रकार विधा की साधना करने वाले को विधा तत्काल फल देती हैं यहाँ तक की संकट की घडी में भी उसका पालन-पोषण करती हैं विधा परदेश में माँ के समान हैं। |
| 3015 | विधा से रहित ब्राह्मण, सैन्यबल से रहित राजा, धन से रहित व्यापारी और सेवाकर्म से रहित शूद्र का कोई महत्व नहीं। |
| 3016 | विधा-प्रप्तिकाल में व्यक्ति को साधना करनी पड़ती हैं अत: इस अवधि में उसे सुख-भोग की इच्छा का परित्याग कर देना चाहिए। इस तप साधना के उपरान्त तो व्यक्ति को सुख ही सुख मिलता हैं अत: बुद्धिमान पुरुष को जीवन-भर के सुख-भोग के लिए अल्पकाल के दुःख सहन करने को उधत रहना चाहिए। |
| 3017 | विधाता ने जिसके भाग्य में जो लिख दिया हैं, उसे कोई भी मिटा नहीं सकता उदाहरण के रूप में यदि वसन्त ऋतु में भी करील के वृक्ष पर पाते नहीं उगते, उल्लू के भाग्य में दिन में देखना नहीं लिखा इसी प्रकार यदि वर्षा की बुँदे चटक के मुख में नहीं जाती तो इसके लिए मेघ को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। |
| 3018 | विधार्थी को अपने लक्ष्य की सफलता के लिए ये आठ बुराइया छोड़ देनी चाहिए। |
| 3019 | विधार्थी सोयेगा तो विद्या प्राप्ति में पिछड़ जायेगा। मुसाफिर सोयेगा तो लुट जायेगा भूखे और भयातुर को वैसे तो नींद ही नहीं आती, किन्तु सो भी रहे हो तो भूखे को भोजन करा दे और भयग्रस्त को आश्वासन से शान्त करें। इसी प्रकार पहरेदार और स्टोर के रक्षक के सोने से हानि होती है और चोरो को चोरी करने का अवसर मिल जाता है। अतः इन्हें सावधान करते रहना चाहिए। |
| 3020 | विध्या अभ्यास से आती है, सुशील स्वभाव से कुल का बड़प्पन होता है। श्रेष्ठत्व की पहचान गुणों से होती है और क्रोध का पता आँखों से लगता है। |
| 3021 | विध्या कामधेनु के समान सभी इच्छाए पूर्ण करने वाली है। विध्या से सभी फल समय पर प्राप्त होते है। परदेस में विध्या माता के समान रक्षा करती है। विद्वानो ने विध्या को गुप्त धन कहा है, अर्थात विध्या वह धन है जो आपातकाल में काम आती है। इसका न तो हरण किया जा सकता हे न ही इसे चुराया जा सकता है। |
| 3022 | विध्यार्थी, नौकर, पथिक, भूख से व्याकुल, भय से त्रस्त, भंडारी और द्वारपाल, इन सातों को सोता हुआ देखे तो तत्काल जगा देना चाहिए क्योंकि अपने कर्मो और कर्तव्यों का पालन ये जागकर अर्थात सचेत होकर ही करते है। |
| 3023 | विनय सबका आभूषण है। |
| 3024 | विनय से युक्त विद्या सभी आभूषणों की आभूषण है। |
| 3025 | विनर्म शब्दों का ज्यादा मूल्य नहीं होता है तथापि इनका प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। |
| 3026 | विनर्मता भरे शब्दों से कोई नुकसान नहीं होता है, पर काफी कुछ हासिल कर सकते है। |
| 3027 | विनाश का उपस्थित होना सहज प्रकर्ति से ही जाना जा सकता है। |
| 3028 | विनाश काल आने पर दवा की बात कोई नहीं सुनता। |
| 3029 | विनाशकाल आने पर आदमी अनीति करने लगता है। |
| 3030 | विपति का जीवन मे आना यह "पार्ट ऑफ लाइफ" है... और उस विपति से भी मुस्करा कर शांति से बाहर निकलना यह "आर्ट ऑफ लाइफ" है । |
| 3031 | विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करे। धन से स्त्री की रक्षा करे और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें। |
| 3032 | विपरीत परस्थितियों में कुछ लोग टूट जाते हैं , तो कुछ लोग लोग रिकॉर्ड तोड़ते हैं। |
| 3033 | विफलता आवश्कता की और आवश्कता अविष्कार की जननी है |
| 3034 | विफलता सिर्फ सबक की तरह होतें हैं इनसे सीखने की जरुरत हैं। |
| 3035 | विरक्त मनुष्य घर-संसार के माया-मोह को छोड़ कर यह भावना अपनाता हैं, कि अब सत्य मेरी माता हैं, ज्ञान मेरा पिता हैं, धर्म मेरा भाई हैं, दया मेरी बहन हैं, शान्ति मेरी पत्नी हैं और क्षमा मेरा पुत्र हैं इस प्रकार सत्य-ज्ञानदी ही अब मेरे सच्चे साथी, हितसाधक और सम्बन्धी हैं। |
| 3036 | विरोधाभास का होना झूठ का प्रतीक नहीं है और ना ही इसका ना होना सत्य का। |
| 3037 | विवाद के समय धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए। |
| 3038 | विवेकहीन व्यक्ति महान ऐश्वर्य पाने के बाद भी नष्ट हो जाते है। |
| 3039 | विवेचना का अभ्यास न होने पर शास्त्र की चर्चा नहीं करनी चाहिए अजीर्ण अथवा अपच होने पर भोजन नहीं खाना चाहिए, दरिद्र व्यक्ति को सभा-पार्टियों आदि में सम्मलित नहीं होना चाहिए और बूढ़े लोगो को युवा स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए इससे उसका शरीर क्षीण ही होगा। |
| 3040 | विशेष कार्य को (बिना आज्ञा भी) करें। |
| 3041 | विशेष स्थिति में ही पुरुष सम्मान पाता है। |
| 3042 | विशेषज्ञ व्यक्ति को स्वामी का आश्रय ग्रहण करना चाहिए। |
| 3043 | विश्व इतिहास में आजादी के लिए लोकतान्त्रिक संघर्ष हमसे ज्यादा वास्तविक किसी का नहीं रहा है। मैने जिस लोकतंत्र की कल्पना की है, उसकी स्थापना अहिंसा से होगी। उसमे सभी को समान स्वतंत्रता मिलेगी। हर व्यक्ति खुद का मालिक होगा। |
| 3044 | विश्व एक व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं। |
| 3045 | विश्व के सभी धर्म, भले ही और चीजों में अंतर रखते हों, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि दुनिया में कुछ नहीं बस सत्य जीवित रहता है। |
| 3046 | विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते है, क्योंकि उनमे समय पर साहस का संचार नही हो पाता। वे भयभीत हो उठते है। |
| 3047 | विश्वविद्यालय महापुरुषों के निर्माण के कारखाने है और अध्यापक उन्हें बनाने वाले कारीगरहै। |
| 3048 | विश्वास उन चीज़ों से जुड़ा होता है जिन्हें हम देख नहीं सकते है और उम्मीद उन चीज़ों से जो हमारे हाथ में नहीं होती है। |
| 3049 | विश्वास और भरोसे की दिल में अलग जगह होती है। हर वक़्त सोचते रहने से विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता है। |
| 3050 | विश्वास करना एक गुण है, अविश्वास दुर्बलता कि जननी है। |
| 3051 | विश्वास की रक्षा प्राण से भी अधिक करनी चाहिए। |
| 3052 | विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए. जब विश्वास अँधा हो जाता है तो मर जाता है। |
| 3053 | विश्वास भगवान का वरदान हैं इसके बिना जीवन नहीं चल सकता ईश्वर के प्रति समर्पित कार्य तभी सार्थक हैं जब वह गहरे विश्वास से उत्पन्न हो, क्यों कि यीशु के कहा है, “ मैं भूखा हूं, मैं नंगा हूं और मैं गृह-विहीन हूं मुझे ऐसा ही समझकर मेरी सेवा करो ” इन्ही सब बातों पर विचार करते हुए अपने मार्ग का निर्धारण करना होगा |
| 3054 | विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है, और गाने लगता है। |
| 3055 | विश्वास से भरा हुआ एक व्यक्ति, ऐसे 99 लोगो के समान है जिनका झुकाव सिर्फ संसारी चीज़ों की तरफ होता है। |
| 3056 | विश्वासघाती की कहीं भी मुक्ति नहीं होती। |
| 3057 | विष प्रत्येक स्तिथि में विष ही रहता है। |
| 3058 | विष में यदि अमृत हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। |
| 3059 | विष से अमृत, अशुद्ध स्थान से सोना, नीच कुल वाले से विद्या और दुष्ट स्वभाव वाले कुल की गुनी स्त्री को ग्रहण करना अनुचित नहीं है। |
| 3060 | विषयों का चिंतन करने से व्यक्ति विषयों के प्रति आसक्त हो जाता हैं आसक्ति से उन विषयों की कामना तीव्र होती हैं, कामना से क्रोध उत्पन्न होता हैं। |
| 3061 | विषयों के त्याग और सहिष्णुता, सरलता दयालुता तथा पवित्रता आदि गुणों को अपनाने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता हैं, मानव को दुर्गुणों का परित्याग करके गुणों-सहनशीलता, दया, क्षमा, शुद्धि आदि को अपनाना चाहिए। |
| 3062 | विषहीन सर्प को भी अपना फन फैलाकर फुफकार करनी चाहिए। विष के न होने पर फुफकार से उसे डराना अवश्य चाहिए। |
| 3063 | विष्णु लक्ष्मी से पूछते हैं की वह ब्राह्मणों से असंतुष्ट क्यों रहती हैं लक्ष्मी उत्तर देती हैं। |
| 3064 | वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है। |
| 3065 | वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है। |
| 3066 | वे लोग जोकि दिल लगा कर काम नहीं कर सकते, उनकी सफलता भी आधी-अधूरी होती है और वह अपने चारों और कडवाहट फैला देती है। |
| 3067 | वे शब्द जो ईश्वर का प्रकाश नहीं देते अँधेरा फैलाते हैं। |
| 3068 | वेद पांडित्य व्यर्थ है, शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है, ऐसा कहने वाले स्वयं ही व्यर्थ है। उनकी ईर्ष्या और दुःख भी व्यर्थ है। वे व्यर्थ में ही दुःखी होते है, जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ नहीं है। |
| 3069 | वेद से बाहर कोई धर्म नहीं है। |
| 3070 | वेदान्त कोई पाप नहीं जानता , वो केवल त्रुटी जानता है। और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो , तुम पापी हो , एक तुच्छ प्राणी हो , और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम ये वो नहीं कर सकते। |
| 3071 | वेदों के तत्वज्ञान को, शास्त्रों के विधान और सदाचार को तथा सन्तो के उत्तम चरित्र को मिथ्या कहकर कलंकित करने वाले लोक-परलोक में भारी कष्ट उठाते हैं। |
| 3072 | वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को, जिसमे वे आमंत्रित किए जाते है, को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते है। |
| 3073 | वैज्ञानिक सोच किसी समय विशेष में विकसित नहीं हो सकती। यह एक प्रक्रिया है जो अनवरत चलती रहती है। |
| 3074 | वैभव के अनुरूप ही आभूषण और वस्त्र धारण करें। |
| 3075 | वैसे तो कहा जाता हैं की संगति का प्रभाव पड़ता हैं परन्तु यह भी सच हैं की सज्जन अथवा श्रेष्ठ पुरुषो पर दुष्टों की संगति का कोई प्रभाव नहीं होता जैसे कि धरती पर खिले पुष्पों की सुगंध तो मिट्टी में आ जाती हैं, परन्तु पुष्पों में मिट्टी की सुगंध नहीं आने पाती, उसी प्रकार सज्जनों संग से दुष्ट तो कभी सुधर भी जाते हैं, परन्तु उन दुर्जनों की संगति से सज्जनों को कोई हानि नहीं होती अथार्थ वे दुष्टता का अंशमात्र भी नहीं अपनाते। |
| 3076 | वैसे तो मनुष्य को प्रत्येक कार्य में ही सावधानी बरतनी चाहिए परन्तु विशेष रूप से इन पांच तत्वों (यज्ञ-क्रिया, तंत्र-अनुष्ठान), धन (उपयोग), धान्य (अन्न, चावल आदि), गुरु का आदेश और औषध का प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए इनके गलत प्रयोग से प्राण-हानि तक हो सकती हैं, अत: इस विषय में विशेष सावधानी अपेक्षित होती हैं। |
| 3077 | वॉइस बॉक्स चलता रहे, इसलिए अधिकतर लोग बोलते है। फिर चाहे उनके पास बाटने के लिए कोई बात हो या नहीं। |
| 3078 | वो जो अच्छाई करने में बहुत ज्यादा व्यस्त है ,स्वयं अच्छा होने के लिए समय नहीं निकाल पाता। |
| 3079 | वो जो एकांत में खुश रहता है या तो एक जानवर होता है या फिर भगवान। |
| 3080 | वो जो कम चुराता है वो उसी इच्छा के साथ चुराता है जितना की अधिक चुराने वाला, परन्तु कम शक्ति के साथ। |
| 3081 | वो जो दूसरों को क्षमा नहीं कर सकता वो उस पुल को तोड़ देता है जिसे उसे पार करना था, क्योंकि हर व्यक्ति को क्षमा पाने की आवश्यकता होती है। |
| 3082 | वो जो प्रशंसा करना जानता है, वह अपमानित करना भी जानता है। |
| 3083 | वो जो बच्चों को शिक्षित करते हो वो उन्हें पैदा करने वालो से ज्यादा सम्मानीय है क्योकि वो उन्हें केवल ज़िन्दगी देते है जबकि वो उन्हें सही तरीके से ज़िन्दगी जीने की कला सीखाते है। |
| 3084 | वो धरती पर मनुष्य के रूप में घुमने वाले पशु है, धरती पर उनका भार है। |
| 3085 | वो पाना जिसके आप लायक नहीं है, कृपा कहलाता है। और वो न पा पाना जिसके कि आप लायक हैं दया कहलाता है। |
| 3086 | वो सत्य नहीं है जो मायने रखता है, बल्कि वो जीत है। |
| 3087 | वो सब कुछ करना जो आप कर सकते हैं , इंसान होना है। वो सब कुछ करना जो आप करना चाहते हैं , भगवान् होना है। |
| 3088 | वो सबसे धनवान है जो कम से कम में संतुष्ट है, क्योंकि संतुष्टि प्रकृति कि दौलत है। |
| 3089 | व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर उठता है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। उदाहरण के लिए महल की चोटी पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा। |
| 3090 | व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित एक प्राणी है, वह जो सोचता है वही बन जाता है। |
| 3091 | व्यक्ति कभी सिंह की गुफा में पहुंच जाए तो सम्भव हैं की हाथी के मस्तक की मणि जिसे गजमुक्ता कहा जाता हैं भी मिल जाए, परन्तु यदि वह गीदड़ की माद में चला जाए तो उसे बछड़े की पूंछ अथवा गधे के चमड़े के सूखे टुकडो के सिवाय और कुछ नहीं मिलेगा, अथार्त साहसी और शूरवीरो की संगति में खतरा होने पर भी दुर्लभ रत्न मिल सकते हैं, किन्तु ठग और कायरो की संगति से कुछ नहीं मिलता। |
| 3092 | व्यक्ति का निर्णायक आकलन इससे नहीं होता है कि वह सुख व सहूलियत की घड़ी में कहा खड़ा है, बल्कि इससे होता है कि वह चुनौती और विवाद के समय में कहां खड़ा होता है। |
| 3093 | व्यक्ति की कीमत इससे नहीं है कि वो क्या प्राप्त कर सकता है, बल्कि इसमें है कि वो क्या दे सकता है। |
| 3094 | व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं अपितु उसके चरित्र से आंकी जाती है। |
| 3095 | व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके गुणों से ही बढती हैं, न कि स्थान से या विशाल सम्पति से, उदाहरण के लिए पूर्णिमा का पूरा चन्द्रमा हो या द्वितीय का क्षीण, परन्तु निष्कलंक चन्द्र, क्या दोनों स्थितियों में पूज्य नहीं होता। |
| 3096 | व्यक्ति के आचरण व्यवहार से उसके कुल का पता चलता हैं, बातचीत से उसके स्थान निवास का पता चलता हैं कि वह कहां का रहने वाला हैं तथा उसके मन के भावो से यह ज्ञात होता हैं कि कितना प्रेम भाव रखता हैं और उसके शरीर को देख कर उसके भोजन की मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता हैं। |
| 3097 | व्यक्ति के पहचान की शरुआत भले चहेरे से होती है, लेकिन उनकी सम्पूर्ण पहचान तो व्यवहार से ही होती है। |
| 3098 | व्यक्ति के मन में क्या है, यह उसके व्यवहार से प्रकट हो जाता है। |
| 3099 | व्यक्ति को इतना अधिक सरल और सीधा नहीं होना चाहिए कि जो भी चाहे उसे धोखा दे सके, जंगल में जाकर देखए कि सीधे खड़े हुए वृक्षों को मनुष्य अपने काम के लिए जल्दी काट लेता हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्षों को छोड़ देता हैं। |
| 3100 | व्यक्ति को इन गुणों का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए-सत्य, दान, आलस्य का अभाव, निंदा न करना क्षमा और धर्य। |
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